बालया वा युवत्या वा वृद्धया वाऽपि योषिता ।
न स्वातन्त्र्येण कर्तव्यं किंचित्कार्यं॑गृहेष्वपि ।।
बचपन में, जवानी में और बुढ़ापे में भी खरी को (अपने) घरों में भी अपनी इच्छा से (क्रमशः पिता, पति और पुत्र आदि अभिभावक की सम्मति के बिना मनमाना) कोई भी काम नहीं करना चाहिये।
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