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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 141
स्पृशन्ति बिन्दवः पादौ य आचामयतः परान्‌ । भौमिकैस्ते समा ज्ञेया न तैरप्रयतो भवेत्‌ ।।
(दूसरे को) कुल्ला कराते या पानी पिलाते हुए व्यक्ति के पैरों पर पड़ने वाली बुँदों (छीटो) को भूमि पर पड़े हुए (जल) के समान मानना चाहिए, उनसे (वह व्यक्ति अशुद्ध होकर) आचमन करने योग्य नहीं होता अर्थात्‌ वह शुद्ध ही रहता है।
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