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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 14
बकं चैव बलाकां च काकोलं खञ्जरीटकम्‌ । मत्स्यादान्‌ विड्वराहांश्च मत्स्यानेव च सर्वशः ।।
बगुला, बलाका (बक जातीय पक्षिविवेष), काकोल (करेरुआ), खजन (खँड़लिच), इन पक्षियों के मांस को, मछलियों को खाने वाले (पक्षिभिन्न नक्र आदि) ग्राम्य सूअर और सब मछलियों के मांस को (न खावे)।
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