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अध्याय 53 — अथ वास्तुविद्याध्यायः

बृहत्संहिता
123 श्लोक • केवल अनुवाद
अब इसके बाद ब्रह्माजी के पास से मुनिपरम्परागत इस वास्तुज्ञान को चतुर दैवज्ञों को प्रसन्नता के लिये मैं कहता हूँ।
प्राचीन काल में अपने शरीर से पृथ्वी और आकाश को आच्छादित करने वाला कोई अपरिचित व्यक्ति उत्पन्न हुआ।
उसको सहसा देवताओं ने पकड़कर नीचे मुख करके पृथ्वी पर स्थापित कर दिया। उस समय उस अपरिचित पुरुष के जिस अङ्ग को जिस देवता ने पकड़ रक्खा था, उन्होंने उस अङ्ग में ही अपना स्थान बना लिया। उस देवमय अपरिचित व्यक्ति को ब्रह्मा जी ने 'वास्तुपुरुष' नाम से कल्पित किया।
राजगृह में १०८ हाथ का विस्तार उत्तम होता है और चारगृह में आठ-आठ हाथ कम करके विस्तार होना चाहिये तथा सपाद विस्तार दैर्ध्य होना चाहिये। जैसे उत्तम गृह में १०८ हाथ विस्तार एवं १३७ हाथ दैध्यं, द्वितीय में १०० हाथ विस्तार एवं १२५ हाथ दैर्घ्य, तृतीय गृह में ९२ हाथ विस्तार एवं ११५ हाथ दैर्घ्य, चतुर्थ गृह में ८४ हाथ विस्तार एवं ११५ हाथ दैर्ध्य और पाँचवें गृह में ७३ हाथ विस्तार एवं ९५ हाथ दैर्ध्य होना चाहिये।
सेनापति के प्रथम गृह का विस्तार ६४ हाथ का बनाना चाहिये। शेष चार मकानों में छः-छः हाथ कम करके विस्तार रखना चाहिये और विस्तार से षष्ठांश अधिक दैर्ध्य बनाना चाहिये। जैसे कि प्रथम गृह का विस्तार ६४ एवं दैर्ध्य ७४ हाथ १६ अंगुल, द्वितीय गृह का विस्तार ५८ हाथ एवं दैर्ध्य ६७ हाथ १६ अंगुल, तृज्य गृह का विस्तार ५२ हाथ एवं दैर्ध्य ६० हाय १६ अंगुल, चौथे गृह का विस्तार ४६ हाथ एवं दैर्ध्य ५३ हाथ १६ अंगुल तथा पाँचवें गृह का विस्तार ४० हाथ एवं दैर्ध्य ४६ हाथ १६ अंगुल होना चाहिये।
मन्त्री के गृह में पहले गृह का विस्तार ६० हाथ होता है। शेष चार मकानों को चार-चार हाथ कम करके बनाना चाहिये। जैसे पहले घर का विस्तार ६० हाथ एवं दैच्यं ६६ हाथ १२ अंगुल। दूसरे घर का विस्तार ५६ हाथ, दैर्ध्य ६३। तीसरे घर का विस्तार ५२ हाथ एवं दैर्ध्य ५८ हाथ १२ अंगुल। चौथे घर का विस्तार ४८ हाथ एवं दैघ्यं ५४ हाथ और पाँचवें घर का विप्तार ४४ हाथ एवं दैर्ध्य ४९ हाथ १२ अंगुल होना चाहिये। इसके आधे विस्तार-दैर्ध्य में राजमहिषी का गृह-निर्माण करना चाहिये; जैसे-प्रथम गृह का विस्तार ३० हाथ एवं दैर्ध्य ३३ हाथ ६ अंगुल। द्वितीय गृह का विस्तार २८ हाथ एवं दैर्ध्य ३१ हाथ १२ अंगुल। तृतीय गृह का विस्तार २६ हाथ एवं दैवं २९ हाथ ६ अंगुल। चतुर्थ गृह का विस्तार २४ हाथ एवं दैर्ध्य २७ हाथ। पञ्चम गृह का विस्तार २२ हाथ एवं दैध्ये २६ हाथ १८ अंगुल होना चाहिये।
इसी प्रकार युवराज के लिये पाँच घर बनाना चाहिये। जिसमें प्रथम गृह का विस्तार ८० हाथ और बाकी चार मकानों में ६-६ हाथ कम करके विस्तार की कल्पना करनी चाहिये। जैसे दूसरे घर का विस्तार ७४, तीसरे का ६८, चौथे का ६२ और पाँचवें का ५६ हाथ होना चाहिये। विस्तार में विस्तार का तीसरा भाग जोड़ कर दैर्ध्य क्रम से १०६।१६, ९८/१६, ९०/१६, ८२।१६ और ७४।१६, कल्पना करनी चाहिये। इसी तरह युवराज के गृह का आधा विस्तार और दैर्ध्य युवराज के छोटे भाई और भृत्यों का होना चाहिये। यथा युवराजानुज का विस्तार ४०, ३७, ३४, ३१, २८ दैर्ध्य ५३१८, ४९१८, ४५१८, ४११८, ३७।८ होनी चाहिये।
पूर्वोक्त राजा के पाँच गृह और मन्त्री के पाँच गृह जो कहे गये हैं, उन दोनों के विस्तार के अन्तर तुल्य विस्तार और दैर्ध्य के अन्तरतुल्य दैर्ध्य लेकर माण्डलिक राजा और प्रधान राजपुरुष का घर बनाना चाहिये। साथ ही राजा और युवराज के गृह के अन्तरतुल्य कशुकी, वेश्या और कलाज्ञाता का मर बनाना चाहिये ।
अधशाला, गजशाला और गोशाला के अधिकारियों तथा और कार्यों के जो स्वामी होते हैं, उन सबके लिये कोश या तिगृह के बराबर गृह बनाना चाहिये। साथ ही कर्म- शाला के जी स्वामी होते हैं, उनका और दूतों का गृह युवराज और मन्त्री के गृह के दैवं-विस्तार कर जो अन्तर हो, उसके बराबर दैप्यं-विस्तार लेकर बनाना चाहिये।
ज्यौतिषी, वैद्य और पुरोहितों को गृह बनाने में प्रथम गृह का विस्तार ४०, द्वितीय का ३६, तृतीय का ३२, चौथे का २८ एवं पाँचवें का २४ और सबके अपने-अपने छठे भाग जोड़ कर जो हो, उतना दैर्ध्य होना चाहिये; यथा-४६।१६, ४२, ३६१८, ३२।१६, २८।
गृह में विस्तार के तुल्य ही उसकी ऊँचाई होनी चाहिये तथा एक शाल वाले गृह में विस्तार से द्विगुणित दैर्ध्य होना चुहिये ।
ब्राह्मण आदि चारो वर्षों के गृहों का विस्तार क्रम से ३२ हाथ में चार-चार हाथ कम करके १६ हाथ पर्यन्त बनाना चाहिये। जैसे-३२, २८, २४, २० या १६ दाय ब्राह्मणों के गृह का: २८, २४, २० या १६ हाथ क्षत्रियों के गृह का; २४, २० या १६ हाथ वैश्यों के गृह का तथा २० या १६ हाथ शूद्रों के गृह का विस्तार बनाना चाहिये।
इससे कम विस्तार का गृह नीच जातियों के लिये बनाना चाहिये। ब्राह्मणों के गृह का दैध्ये विस्तार से दशमांश अधिक, क्षत्रियों का अष्टमांश, वैश्यों का षष्ठांश और शूद्रों के गृह का दैध्यं विस्तार से चतुर्थाश अधिक होना चाहिये।
राजा और सेनापति के गृह के अन्तरतुल्य कोश (खजाना) का घर और रतिभवन (क्रोडागृह) बनाना चाहिये तथा सेनापति और चारो वर्षों के गृह के अन्तरतुल्य राजपुरुषों का घर बनाना चाहिये। जैसे कि सेनापति और ब्राह्मण के गृह के अन्तरतुल्य ब्राह्मण राजपुरुषों का, सेनापति और क्षत्रिय के गृह के अन्तरस्य क्षत्रिय राजपुरुषों का, सेनापति और वैश्य के गृह के अन्तरतुल्य वैश्य राजपुरुषों का तथा सेनापति और शुद्र के गृह के अन्तरतुल्य शुद्र राजपुरुषों का घर बनाना चाहिये।
पारशव ( ब्राह्मण के वीर्य और शूद्रा के रज से उत्पत्र), आदि ( पूर्जकण्टक = ब्राह्मण के वीर्य और वेश्या के रज से उत्पन्न), मूर्धावसिक्त (ब्राह्मण के वीर्य और क्षत्रिया के रज से उत्पन्न ) को माता और पिता के वर्णजनित पूर्वोक्त मान के योगार्थ समान विस्तार दैर्ध्य लेकर गृह बनाना चाहिये। कथित मान से न्यूनाधिक मान वाला गृह सबके लिये अशुभ होता है।
पशु, आश्रमी ( संन्यासी) के गृह, धान्यगृह, आयुधगृह, अग्निगृह और कीड़ागृह को अमित (परिमाणरहित) बनाना चाहिये अर्थात् जैसी इच्छा हो, वैसा निर्मित करना चाहिये। सी हाथ से अधिक ऊँचा गृह बनाने की इच्छा वास्तुशास्त्रकार नहीं करते अर्थात् सी हाथ में अधिक ऊँचा गृह बनाना अशुभ होता है।
सेनापति और राजा के गृह के व्यासमान के योग में सत्तर मिला कर दो जगह रख कर एक जगह चौदह का भाग देने से शाला (गृहाभ्यन्तर भाग) और दूसरी जगह पन्द्रह का भाग देने से अलिन्द (शाला को भित्ति के बाहर सोपान मार्ग) का प्रमाण होता है।
पूर्वोक्त ब्राह्मण आदि के क्रम से ३२, २८, २४, २० और १६ हाथ विस्तार वाले गृह में क्रम से ४ हाथ १७ अद्भुत, ४ हाथ ३ अङ्गुल, ३ हाय १५ अबूल
३ हाथ १३ अद्भुत और ३ हाथ ४ अङ्गल प्रमाण की शाला तथा क्रम से ३ हाथ १९ अङ्गुल, ३ हाथ ८ अबूल, २ हाय २० अङ्गुल, २ हाथ १८ अद्भुत और २ हाथ ३ अङ्गुल प्रमाण का अलिन्द बनाना चाहिये।
शाला के तृतीयांशतुल्य भवन के बाहर वीथिका (स्थला = कृत्रिम भूमि ) बनानी चाहिये। यह जिस भवन के पूर्व में हो वह 'सोष्णीष', जिसके पश्चिम में हो
हो यह 'सायाश्रय', जिसके उत्तर में हो वह 'सावष्टम्भ' और जिसके चारो तरफ हो वह 'सुस्थित संज्ञक वास्तु कहलाती है। इन पूर्वोक्त सभी वास्तुओं की शास्त्रज्ञों द्वारा प्रशंसा की गई है।
भवन के व्यासमान के षोडशांश में चार हाथ मिला कर जितना प्राप्त हो, उतनी प्रथम महल की ऊँचाई, उसमें उसका द्वादशांश हीन करके जो प्राप्त हो, उतनी द्वितीय महल की ऊँचाई और उसमें पुनः उसका द्वादशांश हीन करके जो प्राप्त हो, उतनी तृतीय महल की ऊँचाई इत्यादि बनानी चाहिये।
प्रत्येक पक्की ईंटों से निर्मित गृह के व्यास के सोलहवें भागतुल्य उसके भीत का प्रमाण होना चाहिये। परन्तु लकड़ी से निर्मित गृहों के लिये इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं है, अपितु उसमें अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार भीत का प्रमाण बना लेना चाहिये।
राजा और सेनापति-हेतु निर्मित गृह के विस्तार के एकादश भाग से युत विस्तार में ७० मिलाने पर जो प्राप्त हो, तत्तुल्य अङ्गुल प्रधान द्वार की ऊँचाई और द्वार की ऊँचाई के आधे तुल्य उसका व्यास बनाना चाहिये।
ब्राह्मण आदि वर्षों के गृह के व्यास के पक्षमांश से युत अट्ठारह अङ्गुल में उसका अष्टमांश मिला कर जो प्राप्त हो, उतने अङ्गलतुल्य द्वार का विस्तार और त्रिगुणित विस्तारतुल्य अङ्गल ऊँचाई होनी चाहिये।
हस्त जाति ऊँचाई तुल्य अङ्गुल शाखाओं की मोटाई बनानी चाहिये। उस मोटाई को डेढ़ से गुणा करने पर जो प्राप्त हो, तत्तुल्य अङ्गल उदुम्बर (देहली = 'उदुम्बरस्तु देहल्यामि'ति मेदिनी) की मोटाई होनी चाहिये।
राजा के द्वार की ऊँचाई को ७ से गुजर कर ८० का भाग देने पर जो लब्धि प्राप्त हो, ततुल्य शाखा और औदुम्बर की विस्तृर्ति बनानी चाहिये तथा स्तम्भ की ऊँचाई को ९. से गुणा कर ८० से भाग देने पर जो लब्धि प्राप्त हो, ततुल्य स्तम्भ के मूल की मोटाई और अपना दशाँ भाग होन मोटाई तुल्य अग्र भाग की मोटाई बनानी चाहिये।
स्तम्भ का मध्य भाग समान चार कोण वाला हो तो वह स्तम्भ 'रुचक', आठ कोण वाला हो तो 'वज्र', सोलह कोण वाला हो तो 'द्विवज्र', बत्तीस कोण वाला हो तो 'प्रलौनक' और वर्तुलाकार हो तो 'वृत्त' कहलाता है। ये पाँच स्तम्भ शुभ और शेष अशुभ फल देने वाले होते हैं।
स्तम्भ का नव भाग करके उसमें नीचे के प्रथम भाग का नाम 'बहन' (उस भाग द्वारा भूमि को धारण करने के कारण), द्वितीय भाग का 'पट' ( घड़े को आकृति वाला होने के कारण ), तृतीय भाग का 'पद्म' (पद्याकृति वाला होने के कारण) और चतुर्थ भाग का नाम 'उत्तरोत' (जहाँ पर शोभा के लिये विशेष रूप बनाते हैं) कहा गया है।
स्तम्भतुल्य मोटाई वाला ( राजगृह में स्तम्भ की मोटाई २८ अङ्गुल है, तत्तुल्य मोटाई वाला) पश्चम भाग का नाम 'भारतुला', इसके ऊपर षष्ठ भाग का नाम 'तुला' और उसके ऊपर सप्तम भाग का नाम 'उपतुला' है।
जिस वास्तु के चारो तरफ अलिन्द हो, उसको 'सर्वतोभद्र' वास्तु कहते हैं। यह वास्तु चारों दिशाओं में चार द्वारों से उपलक्षित राजा और देवताओं लिये बनाना चाहिये ।
जिस वास्तु में शाला की भीत से आरम्भ करके प्रदक्षिणक्रम से अलिन्द हो, उसको 'नन्द्यावर्त' वास्तु कहते हैं। इसमें पश्चिम दिशा को छोड़ कर शेष तीन दिशाओं में तीन द्वार रहते हैं।
द्वारालिन्द (प्रधान भवन के द्वार का अलिन्द) के अन्तगत (दक्षिणोत्तर भित्ति संलग्न ) हो और द्वितीय अलिन्द उससे प्रदक्षिणक्रम से गया हो तथा तृतीय अलिन्द उससे प्रदक्षिणक्रम से स्थित हो तो उसको 'वर्षमान' वास्तु कहते हैं। इसके दक्षिण में द्वार नहीं रहता है।
स्वस्तिक' वास्तु में पश्चिम का अलिन्द अन्तगत (दक्षिणोत्तर शाला से संलग्न ) बनाना चाहिये। पश्चिम अलिन्द से निकले हुये अन्य दो अलिन्दों को पूर्व दिशा की शाला से संलग्न करते हुये बनाना चाहिये। उन दोनों के मध्य में पूर्व का अलिन्द बनाना चाहिये। इस स्वस्तिक वास्तु में केवल पूर्व दिशा में द्वार बनाना शुभ होता है: अन्य दिशा में नहीं।
'रुचक' वास्तु में पूर्व और पश्चिम का अलिन्द अन्तगत (दक्षिणोत्तर शाला मे सलग्न) और शेष दो उन दोनों के मध्य में स्थित होता है। इस रुचक वास्तु में उत्तर दिशा का द्वार अशुभ और अन्य (पूर्व, पश्चिम और दक्षिण) द्वार शुभ होता है।
नन्द्यावर्त और वर्धमानसंज्ञक वास्तु सबके लिये श्रेष्ठ होते हैं। स्वस्तिक और रुचकसंज्ञक वास्तु मध्यम होते हैं। शेष सर्वतोभद्रसंज्ञक वास्तु राजा आदि (राजमन्त्री, राजाश्रित पुरुष और देवता) के लिये शुभ होते हैं; अन्य के लिये नहीं।
जिसके उत्तर तरफ भीत ( दीवाल) न हो और शेष तीन दिशाओं में हो, उसको 'हिरण्यनाभ' नामक त्रिशाल वास्तु कहते हैं, यह वास्तु प्रशस्त है। जिसके पूर्व तरफ भीत न हो और शेष तीन दिशाओं में हो, उसको 'सुक्षेत्र' नामक त्रिशाल वास्तु कहते हैं, यह वास्तु धन, पुत्र आदि की वृद्धि करती है।
जिसके दक्षिण तरफ भौत न हो और शेष तीन दिशाओं में हो उसको 'चुल्ली' नामक त्रिशाल वास्तु कहते हैं, यह वास्तु धन का नाश करती है। जिसके पश्चिम तरफ भौत न हो और शेष तीन दिशाओं में हो उसको 'पक्षप्न' नामक त्रिशाल वास्तु कहते हैं, यह वास्तु पुत्र का नाश और वैर कराने वाली होती है।
जिसके पश्चिम और दक्षिण में शाला हो उसको 'सिद्धार्थ', जिसके पश्चिम और उत्तर में शाला हो उसको 'यमसूर्य', जिसके उत्तर और पूर्व में शाला हो उसको 'दण्ड',
जिसके पूर्व और दक्षिण में शाला हो उसको 'वात', जिसके पूर्व और पश्चिम में शाला हो उसको गृह इली' और जिसके दक्षिण और उत्तर में शाला हो उसको 'काच संज्ञक वास्तु कहते हैं।
सिद्धार्थ वास्तु में धन की प्राप्ति, यमसूर्य में गृहस्वामी को मृत्यु, दण्ड में दण्ड से मृत्यु (या दण्ड और वथ), वात में सदा कलह, गृहचुल्ली में धन का नाश और काचसंज्ञक वास्तु में बन्धुओं से विरोध होता है।
इक्यासी पद के क्षेत्र बनाने के लिये दश रेखा पूर्वपरा और दश रेखा दक्षिणोत्तरा बनानी चाहिये, इस तरह रेखायें करने से ८१ कोष्ठ का क्षेत्र बन जायगा। उस कोष्ठ के बाहर तेरह और भीतर बत्तीस देवता होते हैं।
पूर्वोक्त क्षेत्र में ईशान कोण से लेकर क्रम से शिखी, पर्जन्य, जपन्त, इन्द्र, सूर्य, साय, पूरा और अन्तरिक्ष देवता है।
अग्नि कोण से लेकर क्रम से अनिल, पूषा, वितय, बृहत्कात, यम, गन्धर्व, भृङ्गराज और मृग देवता हैं। नैर्ऋत्य कोण में लेकर क्रम में पिता, दौवारिक, मुग्रीव, कुसुमदन्त, वरुण, असुर
शोष और पापयक्ष्मा देवता हैं। वायव्य कोण से लेकर क्रम से रोग, सर्प, मुख्य, भल्लाट, सोम, भुजग, अदिति और दिति देवता
पूर्वोक्त क्षेत्र के अन्तर्गत ये देवता विराजमान हैं। जैसे मध्य के नव कोष्ठों में ब्रह्मा, ब्रह्मा से पूर्व अर्यमा, प्रदक्षिण क्रम से एक पद व्यवहित करके सविता,
विवस्वान, इन्द्र, मित्र, राजयक्ष्मा, पृरीधर, आपवत्स-ये आठ देवता एकान्तर से ब्रह्माजी की परिधि को व्याप्त करके विराजमान है। साथ ही ईशान कोण में पर्जन्य के नीचे आप
आग्नेय कोण में अन्तरिक्ष के नीचे सावित्र, नैर्श्वत्य कोण में दौवारिक के नीचे जय और वायव्य कोण में पापयक्ष्मा के नीचे रुद्र स्थित हैं।
इस क्षेत्र के ईशान कोण में आप, आपवत्स, पर्जन्य, अग्नि, दिति-ये पाँच देवता एकपदिक (एक-एक पद के स्वामी) हैं। इसी तरह प्रत्येक कोण में पाँच-पाँच देवता एकपदिक हैं। जैसे-आग्नेय कोण में सविता, सवित्र, अनल या अनिल, अन्तरिक्ष, पूषा। नैऋत्य कोण में इन्द्र, जय, दौवारिक, पिता, मृग और वायव्य कोण में राजयक्ष्मा, रुद्र, पापयक्ष्या, रोग, नाग-ये पाँच देवता एकपदिक हैं।
शेष बाह्य कोष्ठ में स्थित देवता द्विपदिक हैं, जो कुल बीस होते हैं। जैसे-पूर्व में जयन्त, इन्द्र, सूर्य, सत्य, भृश। दक्षिण में वितथ, बृहत्क्षत, यम, गन्धर्व, पूङ्गराज। पश्चिम में सुग्रीव, कुसुमदन्त, वरुण, असुर, शोष और उत्तर में मुख्य, भल्लाट, सोम, भुजग और अदिति- ये द्विप- दिक देवता हैं। ब्रह्मा से पूर्व आदि दिशाओं में शेष अर्थमा आदि चार देवता ( अर्यमा, विवस्वान्, मित्र और पृथ्वीधर) त्रिपदिक हैं।
यह वास्तु पुरुष ईशान कोण की ओर शिर करके अधोमुख होकर स्थित है। इसके शिर में अग्नि, मुख में आप, स्तन में अर्यमा और छाती में आपवत्स स्थित हैं। बाह्य कोष्ठस्थित पर्जन्य आदि देवता नेत्र, कान, छाती और कन्थे में स्थित हैं।
जैसे-नेत्र में 30 पर्जन्य, कान में जयन्त, छाती में इन्द्र और कन्धे में सूर्य स्थित हैं। तथा भुजा में सत्य आदि पाँच देवता (सत्य, पृत, अन्तरिक्ष, अनिल और पूषा), हाथ में वितथ और बृहत्श्चत, पेट में विवस्वान्, ऊरु में यम, जानु में गन्धर्व, जंपा में भृङ्गराज और कुल्ले में मृग स्थित है।
इसी तरह वाम पार्श्व के सभी अङ्गो में देवता है। जैसे कि वाम स्तन में पृथिवीधर, नेत्र में दिति, कान में अदिति, छाती में भुजग, कन्धे में सोम, बाहु में भल्लाट, मुख्य, अहि, रोग और पापयक्ष्मा, हाथ में रुद्र और राजयक्ष्मा, बगल में शोष और असुर, ऊरु में वरुण, जानु में कुसुमदन्त,
बंधा में सुपीक तथा कुल्ले में दौवारिक स्थित है। इसी तरह लिङ्ग में शक्र और जयन्त, हृदय में बड़ा और पौष में पिता स्थित है। इस तरह इक्यासी पद में नगर, ग्राम, गृह आदि के आब में वास्तु पुरुष के अंगों का विभाग करना चाहिये।
रेखा खींचकर चौंसठ पद का क्षेत्र बनाना चाहिये)। फिर इसके चारो कोनों में कर्णाकार दो-दो रेखायें खींचने से यह क्षेत्र बन जाता है। इस क्षेत्र में चार पर्दो का स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के चारों कोनों में आठ देवता ( आप, आपवत्स, सथिता, सवित्र, इन्द्र, जयन्त, राजयक्ष्मा और रुद्र) और बाहर के चारों कोनों में आठ देवता ( शिखी, अन्तरिक्ष, अनिल अथवा अनल, मृग, पिता, पापयक्ष्मा, रोग और दिति ) अर्धपदीय हैं
इनके दोनों तरफ पर्जन्य, भृश, पूषा, भृङ्गराज, दौवारिक, शोष, नाग और अदिति सार्थपदीय ( डेढ़ पद के स्वामी है तथा शेष बीस देवता ( जयन्त, इन्द्र, सूर्य, सत्य, वितथ, बृहत्संत, यम, गन्धर्व, सुग्रीव, कुसुमदन्त, वरुण, असुर, मुख्य, भल्लाट, सोम, भुजग, अर्यमा, विवस्वान्, मित्र और पृथ्वीधर-ये बीस देवता ) द्विपदीय हैं।
पर्दो के ठीक-गीक मध्य स्थान में वंशों (कोण से कोणगत सूत्रों का परस्पर जो सम्पात हो, उसको 'मर्म स्थान' कहते हैं। बुद्धिमान् पुरुषों को उन मर्मस्थानों को पीड़ित नहीं करना चाहिये (यहाँ पर आचार्य ने वंश और रज्जु का विभाग-प्रदर्शन नहीं किया है; अतः उनका ज्ञान भट्टोत्पलकृत विवृति में प्रदत्त विभाग-प्रदर्शक श्लोकों से करना चाहिये) ।
ये मर्मस्थान अपवित्र भाण्ड आदि वस्तु, कील, खम्भा आदि ( पाषाण आदि) और शस्त्रों से पीड़ित हों तो तत्तुल्य अङ्ग में गृहस्वामी को भी पीड़ा होती है, अर्थात् पीडित मर्मस्थान वास्तु नर के जिस अङ्ग मअवस्थित हो, तत्तुल्य अङ्ग में ही गृहस्वामी को भी पीड़ा होती है।
हवनकाल या प्रश्नकाल में गृह का स्वामी अपने जिस अङ्ग को खुजलावे, वास्तु नर के उसी अङ्गस्थान में शल्य कहना चाहिये। अथवा जिस देवता की आहुति देने के समय अशुभ निमित्त (छोंक, रोना, चिल्लाना, अपान वायु-त्याग या अशुभ शब्द श्रवण ) हो या अग्नि में विकार ( विस्फुलिङ्ग, शब्द के साथ दुर्गन्ध) उत्पन्न हो तो उस देवता के स्थान में शल्य कहना चाहिये।
उपर्युक्त शल्य यदि काष्ठ का हो तो धनहानि, हड्डी का हो तो पशुओं को पीड़ा और रोगभय, लोहे का हो तो शत्र का भय, कपाल या केश का हो तो मृत्यु, कोयले का हो तो चोरभय एवं भस्म का हो तो सर्व अग्निभय होता है। साथ ही सोना और चाँदी के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का शल्य वास्तु पुरुष के मर्मस्थान में स्थित हो तो अत्यन्त अशुभ होता है। यदि धान्यों की भूसी मर्मस्थान या किसी अन्य स्थान में स्थित हो तो वह घर के आगमन को अवरुद्ध करता है। इसी प्रकार नागदन्त यदि मर्मस्थान में अवस्थित हो तो दोष उत्पन्न करने वाला होता है: परन्तु वही नागदन्त यदि मर्मस्थान से अतिरिक्त स्थान में अपस्थित हो तो शुभ होता है।
रोग से वायु तक, पिता से शिखी तक, वितय से शोष तक, मुख्य से भृश तक, जयन्त से भृङ्ग तक और अदिति से सुग्रीव तक
सूत्र बाँधने पर इन सूत्रों के परस्पर नव सम्पात स्थान वास्तुपुरुष के अतिमर्म स्थान होते हैं। साथ ही एक पद में अष्टमांशतुल्य मर्मस्थान का परिमाण होता है।
पूर्वकथित ६ सूत्रों की 'वंश' संज्ञा है तथा वास्तु विभाग के लिये जो पूर्वापरा एवं दक्षिणोत्तरा दश-दश रेखायें की गई हैं, उनकी 'शिरा' संज्ञा होती है। वास्तु में एक पाद का विस्तार जितने हाथ का हो, उतने ही अङ्गुल एक वंश का विस्तार और विस्तार से ड्योढ़ा शिरा का विस्तार होता है।
सुख की कामना करने वाले गृहस्वामी को चाहिये कि घर के मध्य में स्थित ब्रह्मा जी की यलपूर्वक रक्षा करे। उनके ऊपर उच्छिष्ट (जूठन) आदि (अपवित्र वस्तु) को रखने से गृहस्वामी को पीड़ा होती है।
यदि वास्तु पुरुष की दक्षिण भुजा हीन हो तो गृहस्वामी को धननाश और स्रीकृत दोष होता है। इसी प्रकार यदि वाम भुजा हीन हो तो गृहस्वामी के धन-धान्यों का नारा, शिर होन हो तो धन, आरोग्य आदि सब गुणों का नाश
सब गुणों का नाश तथा चरण हीन हो तो स्त्रीदोष, पुत्र की मृत्यु और दासत्व की प्राप्ति होती है। यदि वास्तु पुरुष के सभी अङ्ग पूर्ण हों तो उस स्थान में निवास करने वाले मनुष्य को मान और धन से समन्वित सुख की प्राप्ति होती है।
इसी प्रकार से गृह, नगर और ग्रामों में सभी देवगण विराजमान रहते हैं। उन नगर और ग्रामों में ब्राह्मण आदि वर्णों को भी यथाक्रम निवास करना चाहिये।
ब्राह्मण आदि वर्ण को क्रम से उत्तर आदि दिशा में वासगृह बनाना चाहिये। जैसे ब्राह्मण को उत्तर में, क्षत्रिय को पूर्व में, वैश्य को दक्षिण में और शुद्र को पश्चिम में अपना निवासस्थान बनाना चाहिये। गृह इस प्रकार बनाना चाहिये, जिससे कि आङ्गन में प्रवेश करते समय वे गृह दक्षिण की और पढ़ें। जैसे पूर्वमुख वाले गृह के आङ्गन का द्वार उत्तर में, दक्षिणमुख वाले गृह के आङ्गन का द्वार पूर्व में, पश्चिममुख वाले गृह के आङ्गन का द्वार दक्षिण में और उत्तरमुख वाले गृह के आङ्गन का द्वार पश्चिम में बनाना चाहिये।
इक्यासी पद में नवगुणित सूत्र से और चौंसठ पद में अष्टगुणित सूत्र से विभक्त होकर जो अनल आदि बत्तीस द्वार बनते हैं, अब यहाँ क्रम से उनके फल का प्रदर्शन कर रहे हैं।
शिखी से लेकर अन्तरिक्ष तक आठ देवता पूर्व भाग में अवस्थित होते हैं, उनमें से शिखी के ऊपर द्वार हो तो गृहस्वामी को अग्निभय, पर्जन्य के ऊपर द्वार हो तो कन्याजन्म, जयन्त के ऊपर द्वार हो तो अत्यधिक धन की प्राप्ति, इन्द्र के ऊपर द्वार हो तो राजा को प्रसन्नता, सूर्य के ऊपर द्वार हो तो क्रोध का आधिक्य, सत्य के ऊपर द्वार हो तो असत्य भाषण, भृश के ऊपर द्वार हो तो क्रूरता और अन्तरिक्ष के ऊपर द्वार हो तो तस्करता आती है।
अनिल से लेकर मृग तक आठ देवता दक्षिण भाग में अवस्थित होते हैं। उनमें से अनिल के ऊपर द्वार हो तो अल्प पुत्रता, पौष्ण के ऊपर द्वार हो तो दासत्व, वितथ के ऊपर द्वार हो तो नोचता, बृहत्क्षत के ऊपर द्वार हो तो भोजन, पानवस्तु और पुत्रों की वृद्धि, याम्य के ऊपर द्वार हो तो अशुभ, गन्धर्व के ऊपर द्वार हो तो कृतघ्नता, भृङ्गराज के ऊपर द्वार हो तो निर्धनता और मृग के ऊपर द्वार हो तो पुत्र के बल का विनाश होता है।
पिता से लेकर पापयक्ष्मा तक आठ देवता पश्चिम भाग में अवस्थित रहते हैं। उनमें से पिता के ऊपर द्वार हो तो पुत्रों की पीड़ा, दौवारिक के ऊपर द्वार हो तो शत्रु की वृद्धि, सुग्रीव के ऊपर द्वार हो तो पुत्र और धन का लाभ, कुसुमदन्त के ऊपर द्वार हो तो पुत्र और धन-सम्पत्ति की प्राप्ति, वारुण के ऊपर द्वार हो तो धन-सम्पत्ति का लाभ, असुर के ऊपर द्वार हो तो राजभय, शोष के ऊपर द्वार हो तो धननाश तथा पापयक्ष्मा के ऊपर द्वार हो तो रोग की प्राप्ति होती है।
रोग से लेकर दिति तक आठ देवता उत्तर भाग में अवस्थित होते हैं। उनमें से रोग के ऊपर द्वार हो तो मृत्यु और बन्धन, सर्प के ऊपर द्वार हो तो शत्रु की वृद्धि, मुख्य के ऊपर द्वार हो तो पुत्र और धन का लाभ, भल्लाट के ऊपर द्वार हो तो सम्पूर्ण शौर्यादि गुणों की सम्पत्ति, सोम के ऊपर द्वार हो तो पुत्र से द्वेष, अदिति के ऊपर द्वार हो तो स्त्री के द्वारा दोष तथा दिति के ऊपर द्वार हो तो निर्धनता होती है।
यदि मार्ग, वृक्ष, दूसरे घर का कोना, कूप, खम्भा या प्रम (जल निकलने की मोरी) से गृहद्वार विद्ध होता हो अर्थात् ये सब द्वार के सम्मुख हों तो अशुभ होते हैं। परन्तु गृहद्वार की जितनी ऊँचाई हो, उससे द्विगुणित भूमि को छोड़‌कर आगे वेध करते हुये भी इन मार्गादि का रहना दोषप्रद नहीं होता है।
यदि गृहद्वार मार्ग से वेधित हो तो गृहस्वामी की मृत्यु, वृक्ष से वेधित हो तो बालकों में दोष, पङ्क ( कीचड़) से वेधित हो तो शोक, मोरी से वेधित हो तो व्यर्थ खर्च
कूप से वेधित हो तो मृगी रोग की उत्पत्ति, देवता की प्रतिमा से वेधित हो तो गृहस्वामी का नाश, स्तम्भ से वेधित हो तो खियों में दोष और ब्रह्मा के सम्मुख हो तो सम्पूर्ण कुल का ही नाश करता है।
जिस गृह के द्वार का किवाड़ विना खोले ही खुल जाय, उसमें रहने वाले उन्माद, अपने-आप बन्द हो जाय तो कुल का नारा, पूर्वकथित परिमाण से अधिक
परिमाण हो तो राजभय और प्रमाण से अल्प परिमाण वाला द्वार हो तो चोरभय एवं दुःख होता है। यदि एक घर के द्वार पर दूसरे खण्ड का द्वार पड़े तो शुभ नहीं होता। जिस द्वार की मोटाई अल्प हो, वह भी शुभ नहीं होता है। दिङ्ग की आकृति वाला अति विपुल द्वार क्षुधा का भय करता है और कुबड़ा द्वार कुल का नाश करता है।
यदि ऊपरी काष्ठ आदि के भार से दबा हुआ द्वार हो तो गृहस्वामी को पीड़ा देता है, भीतर की ओर शुका हुआ द्वार हो तो गृहस्वामी की मृत्यु कराता है, बाहर को झुका हुआ द्वार गृहस्वामी को प्रवासी बनाता है और दिग्भ्रान्त (जिस दिशा का द्वार हो, उससे भित्र दिशा को देखता) हो तो गृहस्वामी को चोरों से पीड़ित कराता है।
सुन्दरता को व्यक्त करने वाली जितनी सामग्रियों को एकत्र कर मूल द्वार की रचना की गई हो, उतनी सामग्रियों से अन्य द्वारों की रचना नहीं करनी चाहिये। साथ ही कलश, श्रीफल, पत्र, पुष्प आदि से उस मूल द्वार की शोभा बढ़ानी चाहिये।
गृह के बाहर ईशान आदि चारो कोनों में क्रम से चरकी, विदारिका, पूतना और राक्षसी का निवास होता है।
पुर, भवन और ग्रामों के जो कोने हों, उनमें निवास करने वाले को दोष होता है; किन्तु श्वपच (चाण्डाल, डोम आदि), अन्त्यज (चमार आदि) नीच जातियों के वहाँ (कोने में) निवास करने से गृहस्वामी की उन्नति होती है।
पाकर, बट, गूलर और पीपल- ये चार वृक्ष प्रदक्षिणक्रम से दक्षिण आदि दिशाओं में अशुभ और उत्तर आदि दिशाओं में शुभ होते हैं। जैसे- दक्षिण में पाकर, पश्चिम में वट, उत्तर में गूलर और पूर्व में पीपल का वृक्ष अशुभ तथा उत्तर में पाकर, पूर्व में वट, दक्षिण में गूलर और पश्चिम में पीपल का वृक्ष शुभ होता है।
काँटेदार वृक्ष के गृह-समीप में रहने से गृहस्वामी को शत्रुभय होता है। दूध वाला वृक्ष गृह के समीप में रहने से धन का नाश होता है। फल वाले वृक्ष के गृह के समीप में रहने से सन्तति का नाश होता है।
साथ ही इनके काष्ठों का गृह में प्रयोग करने से भी शुभ नहीं होता है। यदि उपर्युक्त काँटेदार आदि वृक्षों को काट कर उनकी जगह पुत्राग, अशोक, अरिष्ट, वकुल, कटहल, शमी या शाल वृक्ष का रोपण किया जाय तो उपर्युक्त दोषों की प्राप्ति नहीं होती।
प्रशस्त औषधी वाली, दुम ( याज्ञिक वृक्ष पलाश आदि) वाली, लताओं से युत, मधुर मिट्टी वाली, सुगन्धि वाली, निर्मल, समान और छिद्ररहित भूमि जर्ग में गमन से उत्पन्न श्रम को हटाने की इच्छा से वहाँ पर घोड़ी देर के लिये बैठे मनुष्य को भी लक्ष्मी प्रदान करती है। फिर ऐसी भूमि जिनके घर के पास में ही सदा रहती हो, उनके सम्बन्ध में तो कहना ही क्या है? अर्थात् उनको तो अवश्य ही लक्ष्मी की प्राप्ति कराती है।
गृह के समीप में मन्त्री का घर हो तो धननाश, धूर्त का गृह हो तो पुत्रनाश, देवता का गृह हो तो चित्त में खेद, चौराहा हो तो अकीर्ति और चैत्य (प्रधान) वृक्ष हो तो ग्रहों का भय होता है।
दीमक (वाँबी दिवाड़) युत या पोली भूमि गृह के समीप हो तो गृहस्वामी के ऊपर आपत्ति आती है। गृह के समीप गड्डा हो तो प्यास का रोग और कछुये के समान आकृति वाली भूमि गृह के समीप हो तो गृहस्वामी के धन का नाश होता है।
उत्तर की ओर ढलान वाली भूमि ब्राह्मणों के लिये, पूर्व की ओर ढलान वाली भूमि क्षत्रियों के लिये, दक्षिण की ओर ढलान वाली भूमि वैश्यों के लिये और पश्चिम की ओर ढलान वाली भूमि शूद्रों के लिये शुभ होती है।
गृहकर्ता के हाथ से गृहमध्य में एक हाथ लम्बा, एक हाथ चौड़ा और एक हाथ गहरा गड्डा खोदकर पुनः उस गड्ढे को उसी मिट्टी से भरे, यदि गड्ढे को भरने में गड्ढे से हो निकाली गई मिट्टी कम पड़ जाय तो अशुभ, पूरी तरह से गड्डा भर जाय तो सम और गड्डा भरकर मिट्टी ज्यादा हो जाय तो शुभ होता है।
पूर्वकथित प्रकार से गड्ढे को खोदने के पश्चात् उसमें जल भर कर वहाँ से सौ पद तक दूर जाकर पुनः वापस आने पर यदि गड्ढे का जल ज्यों का त्यों बना रहे तो शुभ होता है। इसी प्रकार वहाँ की धूली से एक आढ़क प्रमाण वाली टोकरी को भर कर पुनः उस धूली को तौलने पर यदि वह धूली चौंसठ पल के बराबर हो तो वह भूमि शुभ होती है।
चार बत्ती वाला दीपक जलाकर मिट्टी के कच्चे बर्तन में रखकर उनमें उत्तर आदि क्रम से ब्राह्मण आदि वर्णों को कल्पना करते हुये उस बर्तन को गड्ढे में स्थापित करने पर जिस दिशा की बत्ती देर तक जलती रहे, उस दिशा के वर्ण के लिये वह भूमि शुभ होती है।
सायङ्कल ब्राह्मण आदि वर्णतुल्य वर्ण बाले पुष्पों (सफेद, लाल, पीले और काले पुष्पों) को लेकर गड्ढे में डाल दे और दूसरे दिन प्रात:काल उन पुष्पों को निकाल कर देखने पर जिस वर्ण का पुष्प कुम्हलाया न हो, उसके लिये वह भूमि शुभ होती है। अथवा अपना मन जहाँ पर प्रसन्न रहे वहीं पर निवासस्थान बनाना चाहिये, इसमें अधिक विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
ब्राह्मणादि वर्णों के लिये क्रमशः सफेद, लाल, पीली और काली भूमि शुभ होती है। साथ ही क्रमशः घृतगन्धा, रक्तगन्धा, अन्नगन्धा और मद्यगन्धा भूमि भी शुभ होती है।
ब्राह्मण आदि वर्णों के लिये क्रम से कुशों से युत, मुञ्जों से युत, दूबों से युत एवं कासों से युत भूमि शुभ होती है तथा ब्राह्मणादि के लिये क्रम से मीठी, कषैली, खट्टी और कड़‌वी मिट्टी वाली भूमि भी शुभ होती है।
गृहपति ब्राह्मणों के द्वारा प्रशंसित भूमि को पहले हल से जोतवा कर उसमें बीज वपन करे, तत्पश्चात् उस बीज के पक जाने पर एक रात के लिये उसमें गायों को बैठावे
पुनः दैवज्ञ के द्वारा बताये गये मुहूर्त में वहाँ जाकर अनेक प्रकार के भक्ष्य पदार्थ, दधि, अक्षत, सुगन्ध, पुष्प और धूपों से क्षेत्रपति
स्थपति ( कारीगर ) और ब्राह्मणों की पूजा करके यदि गृहपति ब्राह्मण हो तो शिर, क्षत्रिय हो तो छाती, वैश्य हो तो ऊरू और शूद्र हो तो पाद-स्पर्श करके गृहारम्भ की रेखा खींचे।
यदि अँगूठा, मध्यमा, प्रदेशिनी, सोना, चाँदी, मोती, दही, फल, फूल या अक्षत से गृहारम्भ की रेखा बनायी जाय तो गृहपति के लिये वह रेखा शुभ होती है।
यदि उक्त रेखा शस्त्र से बनाई जाय तो ईत्र से ही गृहस्वामी की मृत्यु, लोहे से बनाई जाय तो बन्धन, भस्म से बनाई जाय तो अग्निभय, तृण से बनाई जाय तो चोरभय और काष्ठ से बनाई जाय तो राजभय होता है।
टेढ़ी, पाँव से बनाई गई या रूपरहित रेखा शत्रुभय और कष्ट प्रदान करने वाली होती है। चमड़ा, कोयला, हड्डी या दाँत से बनाई गई रेखा गृहपति के लिये अशुभ होती है।
वाम क्रम से बनाई गई रेखा शत्रुता और प्रदक्षिण क्रम से बनाई गई रेखा सम्पत्ति प्रदान करने वाली होती है। गृहारम्भ काल में कठोर वचन बोलना, थूकना और छींकना अशुभकारी होता है।
आधे बने या सम्पूर्ण बने हुये गृह में प्रवेश करता हुआ कारीगर आगे कथित चिह्नों को देखे कि गृहस्वामी कहाँ पर स्थित है और किस अङ्ग का स्पर्श कर रहा है? उस समय दीप्त दिशा में स्थित पक्षीगण कठोर शब्द करते हों तो जिस स्थान पर गृहपति खड़ा हो उसके नीचे तथा जिस अङ्ग को गृहपति ने स्पर्श कर रक्खा हो, तत्तुल्य अङ्ग की हड्डी कहनी चाहिये। उदयकाल से एक-एक प्रहर क्रम से पूर्व आदि दिशा में सूर्य रहता है। जैसे कि उदयकाल से एक प्रहर तक पूर्व में, तत्पश्चात् क्रमशः द्वितीय प्रहर तक आग्नेय कोण में, तृतीय प्रहर तक दक्षिण में एवं सायंकाल तक नैऋत्य कोण में
तत्पश्चात् रात्रि के प्रथम प्रहर तक पश्चिम में, द्वितीय प्रहर तक वायव्य कोण में, तृतीय प्रहर तक उत्तर में और रात्रि के चतुर्थ प्रहर तक ईशान कोण में सूर्य रहता है। जिस दिशा का सूयने परित्याग कर दिया हो वह 'अङ्गारिणी', जिसमें स्थित हो वह 'दीप्त', जिसमें जाने वाला हो वह 'घूमित' और शेष पाँच दिशायें 'शान्त' कहलाती हैं। जैसे कि उदय से प्रथम प्रहर तक ईशान कोण अङ्गारिणी, पूर्व दिशा दीप्त, आग्नेय कोण धूमित और शेष पाँच दिशायें शान्तसंज्ञक होती हैं।
शकुन देखने के समय यदि दीप्त दिशा की तरफ मुख करके हाथी, घोड़ा, कुत्ता आदि जीव बोलें तो जिस स्थान पर गृहस्वामी स्थित रहता है, उसके नीचे उन जीवों के उसी अङ्ग की हड्डी होनी चाहिये, जिस अङ्ग का गृहपति स्पर्श कर रहा होता है।
सूत्र फैलाने के समय यदि गदहे का शब्द सुनाई दे तो गृहपति के नीचे हड्डी कहनी चाहिये तथा कुत्ता या सियार उस सूत्र को लाँघ जाय तो भी उक्त स्थान में शल्य कहना चाहिये ।
उस समय जिस स्थान पर शान्त दिशा की और मुख करके पक्षीगण मधुर शब्द करें अथवा वास्तु पुरुष के जिस अङ्ग पर गृहस्वामी अवस्थित हो, उस अङ्ग के नीचे धन कहना चाहिये।
यदि फैलाने के समय सूत्र टूट जाय तो गृहपति की मृत्यु होती है। गाड़ने के समय कील का मुख नीचे की तरफ हो जाय तो गृहपति को बहुत बड़ा रोग होता है। यदि उस समय गृहपति और कारीगर दोनों की स्मरण शक्ति नष्ट हो जाय तो दोनों की मृत्यु कहनी चाहिये।
यदि जल से परिपूर्ण कलश लाने के समय गिर जाय तो गृहपति को शिर का रोग, गिर कर उलट जाय तो गृहस्वामी के कुल में उपद्रव, फूट जाय तो कारीगर की मृत्यु और कलश हाथ से छूट जाय तो गृहस्वामी की मृत्यु होती है।
पहले उत्तर-पूर्व के कोण (ईशान कोण) में पूजन करके शिलान्यास करे, तत्पश्चात् प्रदक्षिण क्रम से शेष शिलाओं का न्यास करे। इसी क्रम से स्तम्भों का भी उत्थापन करना चाहिये।
साथ ही छत्र, माला, वस्त्र, धूप और चन्दन से विभूषित करके स्तम्भ को खड़ा करना चाहिये। इसी प्रकार द्वार को भी यत्नपूर्वक खड़ा करना चाहिये।
यदि स्तम्भ या द्वार के ऊपर पक्षी बैठे हों, खड़ा करने के समय स्तम्भ में कम्पन हो, स्तम्भ गिर जाय या ठीक प्रकार से खड़ा ही न हो सके तो पूर्वकथित इन्द्रध्वज के समान उसका फल समझना चाहिये।
यदि वास्तु भूमि पूर्व या उत्तर में ऊँची हो तो गृहपति के पुत्र और धन का नाश, दुर्गन्धयुत हो तो पुत्र का नाश, टेढ़ी हो तों बन्धुओं का नाश और दिग्भ्रम ( दिशाओं के ज्ञान ने रहित) हो तो स्त्रियों को गर्भ का अभाव होता है। घर की वृद्धि चाहने वाले मनुष्य को वास्तु भूमि में चारो तरफ समान रूप से वृद्धि करनी चाहिये।
यदि वास्तु भूमि को वृद्धि करनी हो तो वह वृद्धि उत्तर या पूर्व की ओर करनी चाहिये; क्योंकि उत्तर या पूर्व की ओर वास्तुभूमि की वृद्धि करने पर अल्प दोष होता है अर्थात् वह दोष ( मित्रों से द्वेष, चित्त में सन्ताप आदि) सहन करने योग्य होता है। फिर भी जिस मनुष्य में इन दोषों को सहन करने की शक्ति न हो, उसके द्वारा वास्तु भूमि की वृद्धि नहीं करनी चाहिये।
यदि वास्तु भूमि की वृद्धि पूर्व की ओर की जाय तो मित्रों से द्वेष, दक्षिण की ओर की जाय तो मृत्यु का भय, पश्चिम की ओर की जाय तो धन का नाश और उत्तर की ओर की जाय तो मन में सन्ताप होता है।
ईशान कोण में देवगृह, अग्नि कोण में पाकगृह, नैऋत्य कोण में गृहसामग्री गृह और वायव्य कोण में धन-धान्यस्थापन गृह बनाना चाहिये।
वास्तु स्थान से पूर्व आदि दिशाओं में यदि जल स्थित हो तो क्रम से पुत्र का नाश, अग्निभय, शत्रुभय, स्त्रियों में कलह, स्त्रियों में दुःशीलता, निर्धनता, घन की वृद्धि और पुत्रों की वृद्धि होती है।
पक्षियों के घोसलों से युक्त, टूटे हुये, देवालय के समीप में स्थित, श्मशान में स्थित, दूध वाले, वच, बहेड़ा, नीम, अरलू-इन सबों को छोड़ कर शेष वृक्षों को घर बनाने के लिये काटना चाहिये।
जिस वृक्ष को काटना हो, उसके निमित्त रात में पूजा और बलि देकर दूसरे दिन प्रातः ईशान कोण की ओर से प्रदक्षिणक्रम से उसको काटना चाहिये। कट जाने के बाद यदि वह वृक्ष उत्तर या पूर्व दिशा की ओर गिरे तो शुभ और शेष दिशाओं में गिरे तो अशुभ होता है।
यदि वृक्ष का कर्तित प्रदेश विकाररहित हो तो उसकी लकड़ी गृह-निर्माण के लिये शुभ होती है। यदि उसमें (कर्तित प्रदेश में पीत वर्ण का मण्डल दिखाई दे तो वृक्ष के मध्य में गोधा ( सनगोहि), मुञ्जीठ की तरह लाल रङ्ग का मण्डल दिखाई दे
तो मेढक, नीले रंग का मण्डल दिखादे तो सर्प, लाल रङ्ग का मण्डल दिखाई दे तो गिरगिट, मूंग के समान वर्ण का मण्डल दिखाई दे तो पत्थर, पीला मण्डल दिखाई दे तो चूहे और खड्ग के सदृश मण्डल दिखाई दे तो वृक्ष के मध्य में जल का निवासस्थान कहना चाहिये।
लक्ष्मी की कामना करने वाले मनुष्य को अन्न, गौ, गुरु, अग्नि एवं देवता तथा वंशों ( 'रोगाद्वायुं पितृतो हुताशनं' इत्याद्युक्त वंशों) के ऊपर शयन नहीं करना चाहिये। उत्तर या पश्चिम की ओर शिर करके भी शयन नहीं करना चाहिये; साथ ही साथ नङ्गे एवं जल से भीगे पाँव विस्तर पर रखकर भी शयन नहीं करना चाहिये।
अतिशय पुष्पों से सुवासित, तोरण से अलंकृत, जलपूर्ण कलशों से सुशोभित, धूप-गन्ध-पुष्प आदि द्वारा पूजित देवताओं से समन्वित एवं ब्राह्मणों द्वारा की गई वेदध्वनियों से पवित्र किये गये गृह में गृहस्वामी को प्रवेश करना चाहिये।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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