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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 103
अर्द्धनिचितं कृतं वा प्रविशन् स्थपतिगृह निमित्तानि । अवलोकयेद् गृहपतिः क्व संस्थितः स्पृशति किं चाङ्गम् ॥
आधे बने या सम्पूर्ण बने हुये गृह में प्रवेश करता हुआ कारीगर आगे कथित चिह्नों को देखे कि गृहस्वामी कहाँ पर स्थित है और किस अङ्ग का स्पर्श कर रहा है? उस समय दीप्त दिशा में स्थित पक्षीगण कठोर शब्द करते हों तो जिस स्थान पर गृहपति खड़ा हो उसके नीचे तथा जिस अङ्ग को गृहपति ने स्पर्श कर रक्खा हो, तत्तुल्य अङ्ग की हड्डी कहनी चाहिये। उदयकाल से एक-एक प्रहर क्रम से पूर्व आदि दिशा में सूर्य रहता है। जैसे कि उदयकाल से एक प्रहर तक पूर्व में, तत्पश्चात् क्रमशः द्वितीय प्रहर तक आग्नेय कोण में, तृतीय प्रहर तक दक्षिण में एवं सायंकाल तक नैऋत्य कोण में
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