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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 59
कण्डूयते यदङ्गं गृहभर्तुर्यत्र वाऽमराहुत्याम् । अशुभं भवेन्निमित्तं विकृतेर्वाग्नेः सशल्यं तत् ॥
हवनकाल या प्रश्नकाल में गृह का स्वामी अपने जिस अङ्ग को खुजलावे, वास्तु नर के उसी अङ्गस्थान में शल्य कहना चाहिये। अथवा जिस देवता की आहुति देने के समय अशुभ निमित्त (छोंक, रोना, चिल्लाना, अपान वायु-त्याग या अशुभ शब्द श्रवण ) हो या अग्नि में विकार ( विस्फुलिङ्ग, शब्द के साथ दुर्गन्ध) उत्पन्न हो तो उस देवता के स्थान में शल्य कहना चाहिये।
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