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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 37
उत्तरशालाहीनं हिरण्यनाभं त्रिशालकं धन्यम्। प्राक्शालया वियुक्तं सुक्षेत्रं वृद्धिदं वास्तु ॥
जिसके उत्तर तरफ भीत ( दीवाल) न हो और शेष तीन दिशाओं में हो, उसको 'हिरण्यनाभ' नामक त्रिशाल वास्तु कहते हैं, यह वास्तु प्रशस्त है। जिसके पूर्व तरफ भीत न हो और शेष तीन दिशाओं में हो, उसको 'सुक्षेत्र' नामक त्रिशाल वास्तु कहते हैं, यह वास्तु धन, पुत्र आदि की वृद्धि करती है।
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