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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 114
इच्छेद्यदि गृहवृद्धिं ततः समन्ताद्विवर्धयेत्तुल्यम् । एकोद्देशे दोषः प्रागथवाऽप्युत्तरे कुर्यात् ॥
यदि वास्तु भूमि को वृद्धि करनी हो तो वह वृद्धि उत्तर या पूर्व की ओर करनी चाहिये; क्योंकि उत्तर या पूर्व की ओर वास्तुभूमि की वृद्धि करने पर अल्प दोष होता है अर्थात् वह दोष ( मित्रों से द्वेष, चित्त में सन्ताप आदि) सहन करने योग्य होता है। फिर भी जिस मनुष्य में इन दोषों को सहन करने की शक्ति न हो, उसके द्वारा वास्तु भूमि की वृद्धि नहीं करनी चाहिये।
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