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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 4
उत्तममष्टाभ्यधिकं हस्तशतं नृपगृहं पृथुत्वेन । अष्टाष्टोनान्येवं पश्च सपादानि दैर्येण ॥
राजगृह में १०८ हाथ का विस्तार उत्तम होता है और चारगृह में आठ-आठ हाथ कम करके विस्तार होना चाहिये तथा सपाद विस्तार दैर्ध्य होना चाहिये। जैसे उत्तम गृह में १०८ हाथ विस्तार एवं १३७ हाथ दैध्यं, द्वितीय में १०० हाथ विस्तार एवं १२५ हाथ दैर्घ्य, तृतीय गृह में ९२ हाथ विस्तार एवं ११५ हाथ दैर्घ्य, चतुर्थ गृह में ८४ हाथ विस्तार एवं ११५ हाथ दैर्ध्य और पाँचवें गृह में ७३ हाथ विस्तार एवं ९५ हाथ दैर्ध्य होना चाहिये।
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