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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 64
सुखमिच्छन् ब्रह्माणं यत्नाद्रक्षेद् गृही गृहान्तः स्थम् । उच्छिष्टाद्युपघाताद् गृहपतिरुपतप्यते तस्मिन् ॥
सुख की कामना करने वाले गृहस्वामी को चाहिये कि घर के मध्य में स्थित ब्रह्मा जी की यलपूर्वक रक्षा करे। उनके ऊपर उच्छिष्ट (जूठन) आदि (अपवित्र वस्तु) को रखने से गृहस्वामी को पीड़ा होती है।
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