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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 60
धनहानिर्दारुमये पशुपीडा रुग्भयानि चास्थिकृते । ( लोहमये शस्त्रभयं कपालकेशेषु मृत्युः स्यात् ॥ अङ्गारे स्तेनभयं भस्मनि च विनिर्दिशेत्सदाऽग्निभयम् । शल्यं हि मर्मसंस्थं सुवर्णरजतादृतेऽत्यशुभम् ॥ मर्मण्यमर्मगो वा निरुणद्ध्यर्थागमं तुषसमूहः ।) अपि नागदन्तको मर्मसंस्थितो दोषकृद् भवति ॥
उपर्युक्त शल्य यदि काष्ठ का हो तो धनहानि, हड्डी का हो तो पशुओं को पीड़ा और रोगभय, लोहे का हो तो शत्र का भय, कपाल या केश का हो तो मृत्यु, कोयले का हो तो चोरभय एवं भस्म का हो तो सर्व अग्निभय होता है। साथ ही सोना और चाँदी के अतिरिक्त किसी भी प्रकार का शल्य वास्तु पुरुष के मर्मस्थान में स्थित हो तो अत्यन्त अशुभ होता है। यदि धान्यों की भूसी मर्मस्थान या किसी अन्य स्थान में स्थित हो तो वह घर के आगमन को अवरुद्ध करता है। इसी प्रकार नागदन्त यदि मर्मस्थान में अवस्थित हो तो दोष उत्पन्न करने वाला होता है: परन्तु वही नागदन्त यदि मर्मस्थान से अतिरिक्त स्थान में अपस्थित हो तो शुभ होता है।
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