जिस वास्तु में शाला की भीत से आरम्भ करके प्रदक्षिणक्रम से अलिन्द हो, उसको 'नन्द्यावर्त' वास्तु कहते हैं। इसमें पश्चिम दिशा को छोड़ कर शेष तीन दिशाओं में तीन द्वार रहते हैं।
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