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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 32
नन्द्यावर्तमलिन्दैः शालाकुड्यात् प्रदक्षिणान्तगतैः । द्वारं पश्चिममस्मिन् विहाय शेषाणि कार्याणि ॥
जिस वास्तु में शाला की भीत से आरम्भ करके प्रदक्षिणक्रम से अलिन्द हो, उसको 'नन्द्यावर्त' वास्तु कहते हैं। इसमें पश्चिम दिशा को छोड़ कर शेष तीन दिशाओं में तीन द्वार रहते हैं।
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