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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 71
अल्पसुतत्वं प्रैष्यं नीचत्वं भक्ष्यपानसुतवृद्धिः । रौद्रं कृतघ्नमधनं सुतवीर्यनं च याम्येन ॥
अनिल से लेकर मृग तक आठ देवता दक्षिण भाग में अवस्थित होते हैं। उनमें से अनिल के ऊपर द्वार हो तो अल्प पुत्रता, पौष्ण के ऊपर द्वार हो तो दासत्व, वितथ के ऊपर द्वार हो तो नोचता, बृहत्क्षत के ऊपर द्वार हो तो भोजन, पानवस्तु और पुत्रों की वृद्धि, याम्य के ऊपर द्वार हो तो अशुभ, गन्धर्व के ऊपर द्वार हो तो कृतघ्नता, भृङ्गराज के ऊपर द्वार हो तो निर्धनता और मृग के ऊपर द्वार हो तो पुत्र के बल का विनाश होता है।
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