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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 104
रविदीप्तो यदि शकुनिस्तस्मिन् काले विरौति परुषरवम् । संस्पृष्टाङ्गसमानं तस्मिन् देशेऽस्थि निर्देश्यम् ॥
तत्पश्चात् रात्रि के प्रथम प्रहर तक पश्चिम में, द्वितीय प्रहर तक वायव्य कोण में, तृतीय प्रहर तक उत्तर में और रात्रि के चतुर्थ प्रहर तक ईशान कोण में सूर्य रहता है। जिस दिशा का सूयने परित्याग कर दिया हो वह 'अङ्गारिणी', जिसमें स्थित हो वह 'दीप्त', जिसमें जाने वाला हो वह 'घूमित' और शेष पाँच दिशायें 'शान्त' कहलाती हैं। जैसे कि उदय से प्रथम प्रहर तक ईशान कोण अङ्गारिणी, पूर्व दिशा दीप्त, आग्नेय कोण धूमित और शेष पाँच दिशायें शान्तसंज्ञक होती हैं।
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