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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 119
रात्रौ कृतबलिपूजं प्रदक्षिणं छेदयेद् दिवा वृक्षम् । धन्यमुदक्प्राक्पतनं न ग्राह्योऽतोऽन्यथा पतितः ॥
जिस वृक्ष को काटना हो, उसके निमित्त रात में पूजा और बलि देकर दूसरे दिन प्रातः ईशान कोण की ओर से प्रदक्षिणक्रम से उसको काटना चाहिये। कट जाने के बाद यदि वह वृक्ष उत्तर या पूर्व दिशा की ओर गिरे तो शुभ और शेष दिशाओं में गिरे तो अशुभ होता है।
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