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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 57
सम्पाता वंशानां मध्यानि समानि यानि च पदानाम् । मर्माणि तानि विन्द्यान्न तानि परिपीडयेत् प्राज्ञः ॥
पर्दो के ठीक-गीक मध्य स्थान में वंशों (कोण से कोणगत सूत्रों का परस्पर जो सम्पात हो, उसको 'मर्म स्थान' कहते हैं। बुद्धिमान् पुरुषों को उन मर्मस्थानों को पीड़ित नहीं करना चाहिये (यहाँ पर आचार्य ने वंश और रज्जु का विभाग-प्रदर्शन नहीं किया है; अतः उनका ज्ञान भट्टोत्पलकृत विवृति में प्रदत्त विभाग-प्रदर्शक श्लोकों से करना चाहिये) ।
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