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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 6
षष्टिश्चतुश्चतुर्भिहींना वेश्मानि पश्च सचिवस्य । स्वाष्टांशयुतो दैर्ध्य तदर्धतो राजमहिषीणाम् ॥
मन्त्री के गृह में पहले गृह का विस्तार ६० हाथ होता है। शेष चार मकानों को चार-चार हाथ कम करके बनाना चाहिये। जैसे पहले घर का विस्तार ६० हाथ एवं दैच्यं ६६ हाथ १२ अंगुल। दूसरे घर का विस्तार ५६ हाथ, दैर्ध्य ६३। तीसरे घर का विस्तार ५२ हाथ एवं दैर्ध्य ५८ हाथ १२ अंगुल। चौथे घर का विस्तार ४८ हाथ एवं दैघ्यं ५४ हाथ और पाँचवें घर का विप्तार ४४ हाथ एवं दैर्ध्य ४९ हाथ १२ अंगुल होना चाहिये। इसके आधे विस्तार-दैर्ध्य में राजमहिषी का गृह-निर्माण करना चाहिये; जैसे-प्रथम गृह का विस्तार ३० हाथ एवं दैर्ध्य ३३ हाथ ६ अंगुल। द्वितीय गृह का विस्तार २८ हाथ एवं दैर्ध्य ३१ हाथ १२ अंगुल। तृतीय गृह का विस्तार २६ हाथ एवं दैवं २९ हाथ ६ अंगुल। चतुर्थ गृह का विस्तार २४ हाथ एवं दैर्ध्य २७ हाथ। पञ्चम गृह का विस्तार २२ हाथ एवं दैध्ये २६ हाथ १८ अंगुल होना चाहिये।
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