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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 34
अपरोऽन्तगतोऽलिन्दः प्रागन्तगतौ तदुत्थितौ चान्यौ । तदवधिविधृतश्चान्यः प्राग्द्वारं स्वस्तिके शुभदम् ॥
स्वस्तिक' वास्तु में पश्चिम का अलिन्द अन्तगत (दक्षिणोत्तर शाला से संलग्न ) बनाना चाहिये। पश्चिम अलिन्द से निकले हुये अन्य दो अलिन्दों को पूर्व दिशा की शाला से संलग्न करते हुये बनाना चाहिये। उन दोनों के मध्य में पूर्व का अलिन्द बनाना चाहिये। इस स्वस्तिक वास्तु में केवल पूर्व दिशा में द्वार बनाना शुभ होता है: अन्य दिशा में नहीं।
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