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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 51
पूर्वोत्तरदिङ्मूर्धा पुरुषोऽयमवाङ्‌मुखोऽस्य शिरसि शिखी। आपो मुखे पर्जन्याऽद्या बाह्या स्तनेऽ स्यार्यमा ह्युरस्यापवत्सश्च ॥
यह वास्तु पुरुष ईशान कोण की ओर शिर करके अधोमुख होकर स्थित है। इसके शिर में अग्नि, मुख में आप, स्तन में अर्यमा और छाती में आपवत्स स्थित हैं। बाह्य कोष्ठस्थित पर्जन्य आदि देवता नेत्र, कान, छाती और कन्थे में स्थित हैं।
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