प्राक्पश्चिमावलिन्दावन्तगतौ तदवधिस्थितौ शेषौ । रुचके द्वारं न शुभदमुत्तरतोऽन्यानि शस्तानि ॥
'रुचक' वास्तु में पूर्व और पश्चिम का अलिन्द अन्तगत (दक्षिणोत्तर शाला मे सलग्न) और शेष दो उन दोनों के मध्य में स्थित होता है। इस रुचक वास्तु में उत्तर दिशा का द्वार अशुभ और अन्य (पूर्व, पश्चिम और दक्षिण) द्वार शुभ होता है।
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