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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 113
प्रागुत्तरोन्नते धनसुतक्षयः सुतवधश्च दुर्गन्धे । वक्ने बन्धुविनाशो न सन्ति गर्भाश्च दिङ्मूढे ॥
यदि वास्तु भूमि पूर्व या उत्तर में ऊँची हो तो गृहपति के पुत्र और धन का नाश, दुर्गन्धयुत हो तो पुत्र का नाश, टेढ़ी हो तों बन्धुओं का नाश और दिग्भ्रम ( दिशाओं के ज्ञान ने रहित) हो तो स्त्रियों को गर्भ का अभाव होता है। घर की वृद्धि चाहने वाले मनुष्य को वास्तु भूमि में चारो तरफ समान रूप से वृद्धि करनी चाहिये।
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