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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 112
विहगादिभिरवलीनैराकम्पितपतितदुःस्थितैश्च तथा । शक्रध्वजसदृशफलं तदेव तस्मिन् विनिर्दिष्टम् ॥
यदि स्तम्भ या द्वार के ऊपर पक्षी बैठे हों, खड़ा करने के समय स्तम्भ में कम्पन हो, स्तम्भ गिर जाय या ठीक प्रकार से खड़ा ही न हो सके तो पूर्वकथित इन्द्रध्वज के समान उसका फल समझना चाहिये।
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