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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 79
पीडाकरमतिपीडितमन्तर्विनतं भवेदभावाय । बाह्यविनते प्रवासो दिग्भ्रान्ते दस्युभिः पीडा ॥
यदि ऊपरी काष्ठ आदि के भार से दबा हुआ द्वार हो तो गृहस्वामी को पीड़ा देता है, भीतर की ओर शुका हुआ द्वार हो तो गृहस्वामी की मृत्यु कराता है, बाहर को झुका हुआ द्वार गृहस्वामी को प्रवासी बनाता है और दिग्भ्रान्त (जिस दिशा का द्वार हो, उससे भित्र दिशा को देखता) हो तो गृहस्वामी को चोरों से पीड़ित कराता है।
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