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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 3
यत्र च येन गृहीतं विबुधेनाधिष्ठितः स तत्रैव । तदमरमयं विधाता वास्तुनरं कल्पयामास ॥
उसको सहसा देवताओं ने पकड़कर नीचे मुख करके पृथ्वी पर स्थापित कर दिया। उस समय उस अपरिचित पुरुष के जिस अङ्ग को जिस देवता ने पकड़ रक्खा था, उन्होंने उस अङ्ग में ही अपना स्थान बना लिया। उस देवमय अपरिचित व्यक्ति को ब्रह्मा जी ने 'वास्तुपुरुष' नाम से कल्पित किया।
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