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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 86
शस्तौषधिद्रुमलता मधुरा सुगन्धा स्निग्ध समा न सुषिरा च महीनराणाम् । वास्तुविद्याध्यायः अप्यध्वनि धत्ते श्रमविनोदमुपागतानां श्रियं किमुत शाश्वतमन्दिरेषु ।।
प्रशस्त औषधी वाली, दुम ( याज्ञिक वृक्ष पलाश आदि) वाली, लताओं से युत, मधुर मिट्टी वाली, सुगन्धि वाली, निर्मल, समान और छिद्ररहित भूमि जर्ग में गमन से उत्पन्न श्रम को हटाने की इच्छा से वहाँ पर घोड़ी देर के लिये बैठे मनुष्य को भी लक्ष्मी प्रदान करती है। फिर ऐसी भूमि जिनके घर के पास में ही सदा रहती हो, उनके सम्बन्ध में तो कहना ही क्या है? अर्थात् उनको तो अवश्य ही लक्ष्मी की प्राप्ति कराती है।
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