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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 21
सायाश्रयमिति पश्चात् सावष्टम्भं तु पार्श्वसंस्थितया । सुस्थितमिति च समन्ताच्छास्त्रज्ञैः पूजिताः सर्वाः ॥
हो यह 'सायाश्रय', जिसके उत्तर में हो वह 'सावष्टम्भ' और जिसके चारो तरफ हो वह 'सुस्थित संज्ञक वास्तु कहलाती है। इन पूर्वोक्त सभी वास्तुओं की शास्त्रज्ञों द्वारा प्रशंसा की गई है।
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