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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 1
वास्तुज्ञानमथातः कमलभवान्मुनिपरम्परायातम् । क्रियतेऽधुना मयेदं विदग्धसांवत्सरप्रीत्यै ॥
अब इसके बाद ब्रह्माजी के पास से मुनिपरम्परागत इस वास्तुज्ञान को चतुर दैवज्ञों को प्रसन्नता के लिये मैं कहता हूँ।
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