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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 80
मूलद्वारं नान्यैद्वरैिरभिसन्दधीत रूपर्धा। तन्मङ्गलैश्चिनुयात् घटफलपत्रप्रमथादिभिश्च
सुन्दरता को व्यक्त करने वाली जितनी सामग्रियों को एकत्र कर मूल द्वार की रचना की गई हो, उतनी सामग्रियों से अन्य द्वारों की रचना नहीं करनी चाहिये। साथ ही कलश, श्रीफल, पत्र, पुष्प आदि से उस मूल द्वार की शोभा बढ़ानी चाहिये।
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