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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 92
आमे वा मृत्पात्रे श्वभ्रस्थे दीपवर्तिरभ्यधिकम् । ज्वलति दिशि यस्य शस्ता सा भूमिस्तस्य स्यि ॥
चार बत्ती वाला दीपक जलाकर मिट्टी के कच्चे बर्तन में रखकर उनमें उत्तर आदि क्रम से ब्राह्मण आदि वर्णों को कल्पना करते हुये उस बर्तन को गड्ढे में स्थापित करने पर जिस दिशा की बत्ती देर तक जलती रहे, उस दिशा के वर्ण के लिये वह भूमि शुभ होती है।
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