ब्राह्मण आदि वर्षों के गृह के व्यास के पक्षमांश से युत अट्ठारह अङ्गुल में उसका
अष्टमांश मिला कर जो प्राप्त हो, उतने अङ्गलतुल्य द्वार का विस्तार और त्रिगुणित
विस्तारतुल्य अङ्गल ऊँचाई होनी चाहिये।
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