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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 33
द्वारालिन्दोऽन्तगतः प्रदक्षिणोऽन्यः शुभस्ततश्चान्यः । तस्मिश्च वर्धमाने द्वारं तु न दक्षिणं कार्यम् ॥
द्वारालिन्द (प्रधान भवन के द्वार का अलिन्द) के अन्तगत (दक्षिणोत्तर भित्ति संलग्न ) हो और द्वितीय अलिन्द उससे प्रदक्षिणक्रम से गया हो तथा तृतीय अलिन्द उससे प्रदक्षिणक्रम से स्थित हो तो उसको 'वर्षमान' वास्तु कहते हैं। इसके दक्षिण में द्वार नहीं रहता है।
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