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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 58
तान्यशुचिभाण्डकीलस्तम्भाद्यैः पीडितानि शल्यैश्च । गृह भर्तुस्तत्तुल्ये पीडामने प्रयच्छन्ति ॥
ये मर्मस्थान अपवित्र भाण्ड आदि वस्तु, कील, खम्भा आदि ( पाषाण आदि) और शस्त्रों से पीड़ित हों तो तत्तुल्य अङ्ग में गृहस्वामी को भी पीड़ा होती है, अर्थात् पीडित मर्मस्थान वास्तु नर के जिस अङ्ग मअवस्थित हो, तत्तुल्य अङ्ग में ही गृहस्वामी को भी पीड़ा होती है।
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