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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 107
दिशि शान्तायां शकुनिर्मधुरविरावी यदा तदा वाच्यः । अर्थस्तस्मिन् स्थाने गृहेश्वराधिष्ठितेऽङ्गे वा ॥
उस समय जिस स्थान पर शान्त दिशा की और मुख करके पक्षीगण मधुर शब्द करें अथवा वास्तु पुरुष के जिस अङ्ग पर गृहस्वामी अवस्थित हो, उस अङ्ग के नीचे धन कहना चाहिये।
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