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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 31
अप्रतिषिद्धालिन्दं समन्ततो वास्तु सर्वतोभद्रम् । नृपविबुधसमूहानां कार्य द्वारे चतुर्भिरपि ॥
जिस वास्तु के चारो तरफ अलिन्द हो, उसको 'सर्वतोभद्र' वास्तु कहते हैं। यह वास्तु चारों दिशाओं में चार द्वारों से उपलक्षित राजा और देवताओं लिये बनाना चाहिये ।
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