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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 28
समचतुरस्त्रो रुचको वन्नोऽष्टास्त्रिर्द्धिवज्रको द्विगुणः । द्वात्रिंशता तु मध्ये प्रलीनको वृत्त इति वृत्तः ॥
स्तम्भ का मध्य भाग समान चार कोण वाला हो तो वह स्तम्भ 'रुचक', आठ कोण वाला हो तो 'वज्र', सोलह कोण वाला हो तो 'द्विवज्र', बत्तीस कोण वाला हो तो 'प्रलौनक' और वर्तुलाकार हो तो 'वृत्त' कहलाता है। ये पाँच स्तम्भ शुभ और शेष अशुभ फल देने वाले होते हैं।
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