पश्चाश्रमिणाममितं धान्यायुधवह्निरतिगृहाणां च ।
नेच्छन्ति शाखकारा हस्तशतादुच्छ्रितं परतः ॥
पशु, आश्रमी ( संन्यासी) के गृह, धान्यगृह, आयुधगृह, अग्निगृह और कीड़ागृह को अमित (परिमाणरहित) बनाना चाहिये अर्थात् जैसी इच्छा हो, वैसा निर्मित करना चाहिये। सी हाथ से अधिक ऊँचा गृह बनाने की इच्छा वास्तुशास्त्रकार नहीं करते अर्थात् सी हाथ में अधिक ऊँचा गृह बनाना अशुभ होता है।
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