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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 122
धान्यगोगुरुहुताशसुराणां न स्वपेदुपरि नाप्यनुवंशम् । नोत्तरापरशिरा न च नग्नो नैव चार्द्रचरणः श्रियमिच्छन् ॥
लक्ष्मी की कामना करने वाले मनुष्य को अन्न, गौ, गुरु, अग्नि एवं देवता तथा वंशों ( 'रोगाद्वायुं पितृतो हुताशनं' इत्याद्युक्त वंशों) के ऊपर शयन नहीं करना चाहिये। उत्तर या पश्चिम की ओर शिर करके भी शयन नहीं करना चाहिये; साथ ही साथ नङ्गे एवं जल से भीगे पाँव विस्तर पर रखकर भी शयन नहीं करना चाहिये।
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