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बृहत्संहिता • अध्याय 53 • श्लोक 10
चत्वारिंशद्धीना चतुश्चतुर्भिस्तु पञ्च यावदिति । षड्भागयुता दैर्ध्य दैवज्ञपुरोधसोर्भिषजः ॥
ज्यौतिषी, वैद्य और पुरोहितों को गृह बनाने में प्रथम गृह का विस्तार ४०, द्वितीय का ३६, तृतीय का ३२, चौथे का २८ एवं पाँचवें का २४ और सबके अपने-अपने छठे भाग जोड़ कर जो हो, उतना दैर्ध्य होना चाहिये; यथा-४६।१६, ४२, ३६१८, ३२।१६, २८।
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