Krishjan
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अध्याय 2 — द्वितीयोऽध्यायः
संन्यास
121 श्लोक • केवल अनुवाद
चालीस संस्कारों
से सम्पन्न तथा समस्त
विषयों
से
वैराग्य
प्राप्त करने वाला पुरुष,
चित्तशुद्धि
को प्राप्त करके,
आशा
,
असूया
(दोषदृष्टि)
,
ईर्ष्या
तथा
अहंकार
को दग्ध कर,
साधनचतुष्टय
(विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व)
विवेक
(नित्यानित्य वस्तु का ज्ञान)
वैराग्य
(लौकिक एवं पारलौकिक भोगों की इच्छा का न होना)
षट्सम्पत्ति
(शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान एवं श्रद्धा)
मुमुक्षुत्व
(मोक्ष की प्रबल इच्छा)
से सम्पन्न होने पर ही
संन्यास
ग्रहण करने का अधिकारी होता है।
जो पुरुष
संन्यास
ग्रहण करने का दृढ़
निश्चय
कर लेने के पश्चात् उसका परित्याग नहीं करता, किन्तु यदि किसी कारण वह उससे विचलित हो जाए, तो उसे
कृच्छ्र प्रायश्चित्त
(प्रायश्चित्तरूप तप)
करना चाहिए; इसके पश्चात् वह पुनः
संन्यास
ग्रहण करने का अधिकारी हो सकता है।
जो व्यक्ति किसी
संन्यासी
को उसके
संन्यासधर्म
से पतित करता है, अथवा जो स्वयं पतित हुए व्यक्ति को अनुचित रूप से पुनः
संन्यास
प्रदान करता है, और जो
संन्यास
में
विघ्न
उत्पन्न करता है — इन तीनों को ज्ञानीजन
अत्यन्त दोषी
मानते हैं।
नपुंसक
,
पतित
,
अंगहीन
,
स्त्रैण स्वभाव वाला
,
बहरा
,
बालक
,
मूक
,
पाषण्डी
,
चक्रधारी सम्प्रदाय का अनुयायी
,
लिङ्गधारी
,
कुष्ठरोगी
,
वैखानस
और
हरद्विज
,
वेतन लेकर अध्यापन करने वाला
,
शिपिविष्ट
,
अनग्निक
तथा
नास्तिक
— ये सभी, चाहे
वैराग्य
से युक्त ही क्यों न हों,
संन्यास
ग्रहण करने के अधिकारी नहीं माने गए हैं। और यदि ये किसी प्रकार
संन्यास
ग्रहण भी कर लें, तो भी वे
महावाक्योपदेश
(उपनिषदों के परम ब्रह्मविद्या-उपदेश)
के अधिकारी नहीं होते।
आरूढ़-पतित
(पूर्व में संन्यास ग्रहण कर उससे पतित हुआ व्यक्ति)
,
पतित व्यक्ति की संतान
,
कुरूप नखों वाला
,
श्याव-दन्त
(अस्वाभाविक अथवा विकृत दाँतों वाला)
,
क्षयरोग
से पीड़ित तथा
अंग-विकल
व्यक्ति — ये संन्यास ग्रहण करने के अधिकारी नहीं माने गए हैं।
आत्महत्या का संकल्प कर चुके व्यक्तियों
,
महापातकियों
,
व्रात्यों
(वैदिक संस्कारों से भ्रष्ट अथवा वंचित व्यक्तियों)
तथा
अभिशस्त
(गंभीर दोष या सामाजिक-धार्मिक दण्ड से ग्रस्त व्यक्तियों)
को
संन्यास
नहीं दिलाना चाहिए।
जो व्यक्ति
व्रत
,
यज्ञ
,
तप
,
दान
,
होम
और
स्वाध्याय
से रहित हो, तथा
सत्य
और
शौच
(बाह्य एवं आन्तरिक पवित्रता)
से भ्रष्ट हो गया हो, उसे
संन्यास
नहीं दिलाना चाहिए। ये सभी व्यक्ति सामान्य विधि से
संन्यास
के अधिकारी नहीं हैं; केवल
आतुर-संन्यास
(मृत्युकाल अथवा अत्यन्त आपात स्थिति में दिया जाने वाला संन्यास)
के अपवाद को छोड़कर।
ॐ भूः स्वाहा
का उच्चारण करके
शिखा
का त्याग करे और
यज्ञोपवीत
को भी त्याग दे; इसके पश्चात् वह गृहस्थ के रूप में बाहर निवास न करे।
"यश
,
बल
,
ज्ञान
,
वैराग्य
और
मेधा
मुझे प्रदान हों" — इस प्रकार प्रार्थना करके
यज्ञोपवीत
को त्याग दे। तत्पश्चात्
ॐ भूः स्वाहा
का उच्चारण करते हुए
वस्त्र
और
कटिसूत्र
को जल में विसर्जित कर दे। इसके बाद —
"मेरे द्वारा संन्यास ग्रहण किया गया"
— इस वाक्य का
तीन बार
मन्त्रोच्चारपूर्वक उच्चारण करे।
संन्यासी द्विज
को देखकर
सूर्यदेव
भी मानो अपने स्थान से विचलित होकर कहते हैं — "
यह संन्यासी
मेरे
मण्डल
को भेदकर उस
परब्रह्म
को प्राप्त करेगा, जो सबसे परे और परम है।"
जो
प्राज्ञ पुरुष
विधिपूर्वक
"मैंने संन्यास ग्रहण कर लिया है"
— ऐसा उद्घोष करता है, वह अपने
साठ पूर्वज कुलों
और
साठ भावी कुलों
का भी
उद्धार
करता है।
वंशपरम्परा
से उत्पन्न जो
दोष
हैं, और जो
शरीरजन्य दोष
हैं,
संन्यास-प्रेष मन्त्ररूप अग्नि
उन सभी दोषों को उसी प्रकार भस्म कर देती है, जैसे
तुषाग्नि
(भूसे की तीव्र अग्नि)
स्वर्ण
की मलिनताओं को जला कर उसे शुद्ध कर देती है।
"सखा मा गोपाये"
(हे मित्रस्वरूप परमात्मन्! मेरी रक्षा करो)
— इस मन्त्र का उच्चारण करके
दण्ड
को ग्रहण करना चाहिए।
दण्ड
वैणव
(बाँस से निर्मित)
,
सौम्य
(सुन्दर एवं संतुलित)
,
छाल सहित
तथा
सम पर्वों वाला
(जिसकी गाँठें समुचित हों)
होना चाहिए। वह
पवित्र स्थान
में उत्पन्न हुआ हो तथा विविध प्रकार की
अशुद्धियों
से भली-भाँति शुद्ध किया गया हो।
वह
दण्ड
ऐसा होना चाहिए जो
अग्नि से जला हुआ न हो
,
कीड़ों द्वारा क्षतिग्रस्त न हो
, तथा जिसकी
पर्व-गाँठें
स्पष्ट और सुन्दर हों।
यति
को ऐसा दण्ड धारण करना चाहिए जो या तो
नासिका
तक पहुँचता हो, अथवा
सिर
अथवा
भ्रूमध्य
की ऊँचाई के समतुल्य हो।
दण्ड
और
संन्यासी
का परस्पर
संयोग
(सदैव साथ रहना)
प्रत्येक स्थिति में आवश्यक माना गया है। इसलिए
बुद्धिमान् यति
को
दण्ड
के बिना
तीन बाणों की दूरी
(अत्यल्प दूरी)
तक भी नहीं जाना चाहिए।
हे सर्वसौम्य!
आप
जीवन
के आधारभूत
जल
को धारण करने वाले हैं, मुझसे मन्त्रणा करते रहें— ऐसा कहकर
संन्यासी
कमण्डलु
को हाथ में ग्रहण करे।
योगपट्ट
से सुशोभित होकर वह सुखानुभूतिपूर्वक यत्र-तत्र भ्रमण करे।
(संन्यासी को)
सभी प्रकार के
धर्म-अधर्म
तथा
सत्य-असत्य
— दोनों का ही
परित्याग
कर देना चाहिए। तदनन्तर जिसके द्वारा इस प्रकार
सत्य
और
असत्य
का परित्याग किया जाता है, उसका भी
त्याग
कर देना चाहिए।
संन्यासी
के चार भेद बताए गए हैं—
वैराग्य संन्यासी
ज्ञान संन्यासी
ज्ञान-वैराग्य संन्यासी
कर्म संन्यासी
दृष्ट
एवं
आनुश्रविक विषयों
के प्रति
तृष्णारहित
होकर तथा
पूर्वजन्म
के
पुण्यों
के फलस्वरूप
वैराग्य
उत्पन्न होने के कारण जिस मनुष्य ने
संन्यास-धर्म
ग्रहण किया है, वह
वैराग्य संन्यासी
कहलाता है।
(सांख्य-योग की मान्यता के अनुसार
'दृष्ट'
विषय वे हैं, जो इस लोक में प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर होते हैं; जैसे—
रूप
,
रस
,
गन्ध
आदि,
धन-सम्पत्ति
,
स्त्री
,
राज-ऐश्वर्य
आदि।
'आनुश्रविक'
विषय वे हैं, जो
वेद
और
शास्त्रों
द्वारा सुने गए हैं। ये भी दो प्रकार के होते हैं—
(क)
देवलोक
,
स्वर्ग
,
विदेह
तथा
प्रकृतिलय
का आनन्द और
(ख)
दिव्य गन्ध
,
दिव्य रस
आदि,
अणिमा
,
गरिमा
,
महिमा
आदि
सिद्धियाँ
।
वैराग्य संन्यासी
इन दोनों प्रकार के विषयों से विरक्त होता है।)
शास्त्रों
का
ज्ञान
प्राप्त करके,
पाप-पुण्य
तथा
सांसारिक अनुभवों
का विवेकपूर्वक विचार कर,
प्रपञ्च
से परे
(उपराम)
होकर,
शरीर-वासना
(पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लौकैषणा)
,
शास्त्र-वासना
(शास्त्रों पर अत्यधिक निर्भर रहना)
तथा
लोक-वासना
(लौकिक व्यवहारों की प्रमुखता)
का परित्याग करके, समस्त प्रकार की
सांसारिक प्रवृत्तियों
को
वमन किए हुए अन्न
के समान त्याज्य मानकर तथा
साधनचतुष्टय
(विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व)
से सम्पन्न होकर जो
संन्यास-धर्म
को स्वीकार करता है, उसे
ज्ञान संन्यासी
कहा गया है।
क्रमानुसार सभी का
अभ्यास
करके, सभी
अनुभव
प्राप्त करके,
ज्ञान
एवं
वैराग्य
के तत्त्व को भली-भाँति जानकर तथा केवल
देह
मात्र को अवशिष्ट मानकर जो
संन्यास-धर्म
ग्रहण करता है, वह
ज्ञान-वैराग्य संन्यासी
कहलाता है।
ब्रह्मचर्य
,
गृहस्थ
एवं
वानप्रस्थ
—इन तीनों
आश्रमों
का पालन करने के पश्चात्,
वैराग्य
(की दृढ़ स्थिति)
न होने पर भी नियमानुसार
संन्यास
ग्रहण करना चाहिए। यही
कर्म-संन्यासी
के लक्षण बताए गए हैं।
इस
संन्यास
के छह भेद हैं—
कुटीचक
,
बहूदक
,
हंस
,
परमहंस
,
तुरीयातीत
तथा
अवधूत
।
कुटीचक संन्यासी
शिखा
(चोटी)
एवं
यज्ञोपवीत
को अपने शरीर पर धारण किए रहता है। इसके अतिरिक्त वह
दण्ड
,
कमण्डलु
,
कौपीन
(लँगोटी)
,
चादर
तथा
कन्था
(कथरी)
धारण करता है। वह
माता-पिता
तथा
गुरु
की आराधना करने वाला होता है। वह अपने पास केवल
बटलोई
,
कुदाली
और
छींका
रखता है,
एक ही स्थान
पर भोजन करता है, मस्तक पर ऊपर की ओर
श्वेत त्रिपुण्ड्र
धारण करता है तथा
त्रिदण्ड
भी धारण करता है।
बहूदक संन्यासी
शिखा
,
कन्था
(कचरी)
तथा
त्रिपुण्ड्र
धारण करने वाला होता है। वह सभी प्रकार से
कुटीचक
की भाँति
मधुकरी-वृत्ति
(भिक्षा)
वाला होता है तथा केवल
आठ ग्रास
भोजन ग्रहण करता है।
हंस संन्यासी
जटाधारी
(लम्बे केशों वाला)
,
त्रिपुण्ड्र
एवं
ऊर्ध्वपुण्ड्र
धारण करने वाला,
अनजान स्थान
पर माँगकर
भोजन
करने वाला तथा केवल
कौपीन
(लँगोटी)
धारण करने वाला होता है।
परमहंस संन्यासी
शिखा
और
यज्ञोपवीत
से विहीन होता है। वह
पाँच घरों
से
हाथरूपी पात्र
में
भिक्षा
ग्रहण करता है। वह अपने पास केवल
एक लंगोटी
,
एक चादर
तथा
एक बाँस का दण्ड
रखता है। अथवा
शरीर
पर
भस्म
धारण करके केवल
एक चादर
ही अपने पास रखता है और अन्य सभी वस्तुओं का
परित्याग
कर देता है।
तुरीयातीत संन्यासी
सब कुछ
त्याग
देने वाला,
गोमुख-वृत्ति
वाला तथा केवल
तीन गृहों
से
फल
अथवा
अन्न
की
भिक्षा
ग्रहण करने वाला होता है। वह अपना
शरीर
नग्न
रखता है
(अर्थात् बिना वस्त्र आदि के)
। वह अपने
शरीर
को
मृत
के समान मानकर किसी प्रकार जीवन-निर्वाह करता है।
अवधूत संन्यासी
किसी भी प्रकार का
नियम
नहीं मानता।
पतित
और
निन्दित
के अतिरिक्त समस्त
जातियों
से
अजगर-वृत्ति
द्वारा
आहार
प्राप्त करने वाला होता है। वह अपने
स्वरूप
की खोज में ही सतत लगा रहता है।
यह
वृक्ष
,
घास-पात
,
पर्वत
आदि सम्पूर्ण
विश्व
मुझसे अलग है।
बाह्य जगत्
में जो कुछ भी दृष्टिगोचर हो रहा है, वह अत्यन्त
जड़
है। मैं उसमें किस प्रकार स्थित रह सकता हूँ? क्योंकि मैं
विराट्
हूँ। मैं
काल
के द्वारा कल्पित तथा शीघ्र ही विलीन होने वाला भी नहीं हूँ।
मैं
(संन्यासी)
वह
जड़
शब्दरूप
नहीं हूँ, जो क्षणमात्र ही ठहरता है। मैं
शून्य
,
आकृतिरहित
एवं
अचेतन
भी नहीं हूँ।
इस प्रकार क्षणभर में नष्ट होने वाली तथा बनने-बिगड़ने वाली
त्वचा
भी मुझसे भिन्न है। मैं वह
जड़
(अचेतन)
स्पर्श
नहीं हूँ, जो
चैतन्य
के प्रभाव से
आत्मानुभूति
प्राप्त करता है।
चंचलता
से युक्त
मन
तथा
मन
से युक्त
जिह्वा
द्वारा
द्रव्य
से उत्पन्न तुच्छ
स्पन्दन-शक्ति
भी मैं नहीं हूँ।
इसी प्रकार
दृश्य
एवं
दर्शन
के विलीन हो जाने पर विनष्ट हो जाने वाला
अचेतन
,
जड़ अनुभव
भी मैं नहीं हूँ। मैं तो केवल
द्रष्टा
मात्र हूँ।
गन्ध
भी
जड़ पदार्थ
से युक्त तथा
घ्राणेन्द्रिय
द्वारा परिकल्पित है। ऐसी तुच्छ
जड़-गन्ध
भी मैं नहीं हूँ।
मैं
(संन्यासी)
पञ्चेन्द्रियों
के भ्रम से रहित,
मननरहित
,
शान्तस्वरूप
तथा
मलिनतारहित
शुद्ध चैतन्य
मात्र हूँ।
मैं
(संन्यासी)
चैतन्य
से भी परे
चिन्मात्र प्रकाश
से युक्त हूँ। मैं
बाह्य
एवं
अन्तः
में सर्वव्याप्त रहने वाला
निष्कल
(कलारहित)
,
निरञ्जन
,
निर्विकल्प
,
चिदाभास
तथा
सर्वव्यापी आत्मतत्त्व
हूँ।
मुझ
एक चैतन्यस्वरूप
के द्वारा ही
घट
,
पट
आदि से लेकर
सूर्य
पर्यन्त सभी
दीपक
के सदृश तेजवान् विनिर्मित होते हैं।
ये सभी
इन्द्रियों
की विचित्र एवं भिन्न-भिन्न प्रकार की
वृत्तियाँ
(प्रवृत्तियाँ)
मेरे
अन्तःकरण
के प्रकाश से ही प्रादुर्भूत होती हैं, जैसे
अग्नि
से
चिनगारियाँ
निःसृत होती हैं।
यह
पवित्र चिन्मय दृष्टि
अन्तरहित
,
शाश्वत
,
आनन्द
का उपभोग कराने वाली तथा
अत्यन्त शान्ति
प्रदान करने वाली है। यह अन्य समस्त
दृष्टियों
पर विजय प्राप्त कराने वाली है।
यह
मुक्तात्मा
सभी प्रकार की
भावनाओं
में स्थिर रूप से स्थित रहता है। यह
चैत्य अवस्था
से भी मुक्त
चिदात्मा
है। इस
सर्वव्यापक चैतन्यस्वरूप आत्मा
को नमस्कार है।
कला
एवं
कल्पनाविहीन चित्शक्ति
से ही इन विचित्र, स्वच्छ तथा
समभाव
से सम्पन्न शक्तियों का प्राकट्य हुआ है। यह
चित्शक्ति
तीनों
कालों
में सर्वाधिक
शक्तिसम्पन्न
तथा
दृश्यजगत्
के बन्धनों से मुक्त है।
यह
वाणी
से जानी नहीं जा सकती। यह
शाश्वत
है। यह
असत्ता
तथा
निरति आत्मा
के सदृश नहीं है, बल्कि उनसे परे स्थित रहती है।
जो
चित्शक्ति
इच्छा
एवं
अनिच्छा
में स्थित है, वह
मलों
से आच्छादित रहती है तथा
पाश
से आबद्ध
पक्षिणी
की भाँति उड़ने में असमर्थ होती है।
इच्छा
एवं
द्वेष
से उत्पन्न
द्वन्द्वभाव
के कारण ये
मोहवश
पृथ्वीरूपी गड्ढे
में गिरे हुए
कृमि-कीटों
के समान हैं।
मुझ
अविच्छिन्न चित्स्वरूप आत्मा
को
नमन-वन्दन
है। मैं
सतत
,
परम प्रत्यक्ष
,
बुद्ध
तथा
उदित
हूँ।
मैं
उद्धृत
हूँ,
विकल्पों
से परे हूँ। मैं जो हूँ, वही हूँ। मुझे नमस्कार है।
तुम
और
मैं
में कोई अन्तर नहीं है।
मैं
और
तुम
दोनों ही
चिदात्मा
हैं। दोनों को नमस्कार है।
मुझ
परमेश्वर
तथा
शिवस्वरूप
को नमस्कार है। यह
(आत्मा)
बैठता
हुआ भी वास्तव में आसीन नहीं होता,
जाता
हुआ भी नहीं जाता,
शान्त
रहते हुए भी व्यवहार में लगा रहता है तथा
कार्य
करता हुआ भी कभी
आसक्त
नहीं होता।
यह
(आत्मा)
सुलभ
है,
आत्मबन्धु
के सदृश है तथा
शरीररूपी कमल
में
भ्रमर
की भाँति स्थित है।
न तो मुझ
(आत्मा)
को
भोग
करते रहने की इच्छा है और न ही
भोग
का त्याग करने की। जो आता हो, वह आ जाए और जो जाना चाहता हो, वह चला जाए।
मन
से
मन
के अलग हो जाने पर,
अहंकार
के विसर्जित हो जाने पर तथा
भाव
के विनष्ट हो जाने पर, मैं
(आत्मा)
केवल
स्वस्थस्वरूप
में स्थित रहता हूँ।
मैं
भावशून्य
,
अहंकाररहित
,
मनःशून्य
,
चेष्टारहित
,
स्पन्दविहीन
तथा केवल
शुद्ध आत्मस्वरूप
हूँ। मेरा
शत्रु
कहाँ हो सकता है?
मेरे
शरीररूपी पिंजड़े
में निवास करने वाली
निरहंकारिता
रूपी
पक्षिणी
,
तृष्णा
रूपी
रज्जु
(रस्सी)
को काटकर न जाने कहाँ उड़कर चली गई।
जिसमें
अकर्तापन
का भाव विद्यमान है, जिसकी
बुद्धि
में
आसक्ति
नहीं है तथा जो समस्त
भूत-प्राणियों
को
समभाव
से देखता है, निश्चय ही उसी का
जीवन
शोभनीय है।
जिसका
अन्तःकरण
अत्यन्त
शीतल
है, जिसकी
बुद्धि
राग-द्वेष
आदि से मुक्त हो चुकी है तथा जो
साक्षीभाव
से इस
जगत्
का अवलोकन करता है, ऐसे उस
श्रेष्ठ संन्यासी
का
जीवन
अत्यधिक शोभनीय है।
जिसे
पूर्ण ज्ञान
प्राप्त हो गया है, जिसने
अच्छाई
एवं
बुराई
के ध्यान का परित्याग कर दिया है तथा जिसने
चित्त
को
चित्त
में ही संयुक्त कर दिया है, उसी
संन्यासी
का
जीवन
अत्यन्त सुन्दर है।
ग्राह्य
एवं
ग्राहक
का सम्बन्ध विनष्ट हो जाने के पश्चात्
स्थिर शान्ति
का उदय होता है। इसी कारण
शान्ति
को ही
मोक्ष
कहा जाता है।
जिस प्रकार
भुना हुआ बीज
अंकुर उत्पन्न करने में असमर्थ रहता है, उसी प्रकार जो
जीवनमुक्त
हो जाते हैं, उनके
हृदय
की
वासना
और
आसक्ति
प्रायः पूर्ण
पवित्रता
से युक्त हो जाती है।
वे
पतित-पावन
,
परम उदार
,
शुद्ध सत्य
को आत्मसात् करने वाले,
आत्मध्यान
से सम्पन्न तथा अपने-अपने
नित्यस्वरूप
में प्रतिष्ठित रहते हैं।
जब
चेतन तत्त्व
चित्त-मुक्त
हो जाता है, तभी वह
आत्मरूप चैतन्यतत्त्व
कहलाता है। जब
स्वभाव-मन
(इच्छा)
से रहित हो जाता है, तब उसमें किसी भी प्रकार के
दोष
प्रकट नहीं होते।
वही
सत्यता
है, वही
शिवस्वरूप
है और उसी में
परमात्मा
अवस्थित है। वही
सर्वज्ञता
है, वही
सम्पूर्ण तृप्ति
है; न कि वहाँ, जहाँ
मन
क्षतिग्रस्त
(मेरे-तेरे में बँटा हुआ)
हो।
यद्यपि मैं
प्रलाप
करता,
परित्याग
करता,
स्वीकार
करता,
चक्षुओं
को खोलता और बन्द करता रहता हूँ, फिर भी मैं
मननशील
,
आनन्दस्वरूप
,
संवित्
(ज्ञानरूप)
आत्मा
ही हूँ।
संवेद्यरूपी मन
को दूर करके तथा
मन
को
निर्मूल
(इच्छारहित)
बना,
आशा
रूपी
फन्दे
को काटकर, मैं केवल
संवित्स्वरूप
ही हूँ।
शुभ
एवं
अशुभ संकल्पों
से मुक्त तथा सम्यक् रूप से
शान्त
होकर मैं
आरोग्य अवस्था
में स्थित हूँ।
इष्ट
तथा
अनिष्ट
के भाव का परित्याग करके मैं केवल
संवित्स्वरूप
ही हो गया हूँ।
राग
एवं
द्वेष
के भावों का परित्याग करके,
विभागरहित
,
नश्वर जगत्
में प्रतिष्ठित
दृढ़ आत्मारूपी साम्य
के आश्रय में मैं पूर्णरूप से प्रतिष्ठित हूँ। मैं अपनी
निर्मल
एवं
आशारहित
संवित्
(आत्मिक दशा)
में प्रतिष्ठित हूँ।
चेष्टा
और
चेष्टारहितता
तथा
हेय
एवं
उपादेय
की भावना से मैं मुक्त हो चुका हूँ। मैं
आत्मिक सन्तोष
को कब प्राप्त करूँगा?
स्वयंप्रकाशस्वरूप
पद में कब प्रतिष्ठित होऊँगा?
पर्वत-श्रृंखला
की
गुफा
में
आसन
ग्रहण करके
शान्त भाव
से मैं कब
चिन्तन-मनन
करूँगा? मैं
निर्विकल्प समाधि
लगाकर
शिला
के समान कब
चेष्टारहित
हो जाऊँगा?
मैं उस
अंशविहीन
,
अविनाशी ब्रह्म
के
चिन्तन
में इस प्रकार कब
निश्चल
हो जाऊँगा कि
कोयल
पक्षी मेरे
मस्तक
पर घोंसला बना लें?
मैं
संकल्प
रूपी
वृक्षों
तथा
तृष्णा
रूपी
लताओं
को काटकर
मन
रूपी विशाल
वन
को पार कर
विस्तृत भूमि
(मैदान)
में पहुँचकर आनन्दपूर्वक विचरण करता हूँ।
मैं उस परम पद को प्राप्त हो चुका हूँ। मैं अकेला
(अद्वितीय)
हूँ। मैं विजयी हूँ। मैं
निर्वाणस्वरूप
हूँ,
निःस्पृह
हूँ,
निरंश
हूँ तथा
निष्काम
हूँ।
स्वच्छता
,
बलसम्पन्नता
,
सत्तास्वरूपता
,
हृदय की पवित्रता
,
सत्यता
और
ज्ञाता-भाव
—ये उसके स्वरूप हैं। वह
आनन्दमय
,
उपशान्त
, सदा
प्रमुदित
एवं
प्रकाशमान
रहता है। वह
पूर्ण
,
उदार
,
सत्यस्वरूप
,
कान्तिमय
,
सत्तामय
तथा सदा
एकत्वस्वरूप
है।
इस प्रकार
भिक्षु
निरन्तर चिन्तन करता हुआ सहज ही
स्वरूपस्थिति
को प्राप्त हो गया।
निर्विकल्पस्वरूप
का ज्ञान प्राप्त करके वह स्वयं
निर्विकल्प
हो गया।
यदि
आतुर संन्यासी
संन्यास
ग्रहण करने की इच्छा से जीवित रहे, तभी उसे
क्रम-संन्यास
प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए।
शूद्र
,
स्त्री
,
पतित
तथा
रजस्वला
से कभी भी सम्भाषण नहीं करना चाहिए। किसी भी
देवता
के
पूजनोत्सव
को देखने के लिए
संन्यासी
को कभी नहीं जाना चाहिए। ये
लौकिक कार्य
संन्यासी
के लिए नहीं हैं।
आतुर
और
कुटीचक
का
भूः
एवं
भुवः लोक
होता है,
बहूदक
का
स्वर्गलोक
,
हंस
का
तपोलोक
तथा
परमहंस
का स्थान
सत्यलोक
होता है।
तुरीयातीत
तथा
अवधूत
श्रेणी के लोग
भ्रमर-कीट न्याय
के समान अपने
स्वरूप
का
अनुसंधान
करते हुए
कैवल्य
(केवल आत्मतत्त्व)
में प्रतिष्ठित हो जाते हैं।
संन्यासी
के लिए अपने
स्वरूप
के
अनुसंधान
के अतिरिक्त अन्य विभिन्न
शास्त्रों
का निरन्तर अभ्यास करना
ऊँट
पर
केशर
लादने के समान निरर्थक है।
संन्यासी
के लिए
योग
की प्रवृत्ति,
सांख्यशास्त्र
का व्यापार,
मन्त्र-तन्त्र
का अभ्यास तथा किसी भी
शास्त्र
की प्रवृत्ति वर्जनीय है। यदि कोई
संन्यासी
ऐसा करता है, तो वह
मृतक शरीर
पर
आभूषण
धारण कराने के समान है तथा
संन्यासी
के
कर्म
और
विद्या
के अनुकूल नहीं है।
संन्यासी
को किसी भी
देवता
के
नाम
,
कीर्तन
आदि में भाग नहीं लेना चाहिए। कारण यह है कि कोई भी
कर्म
करने के बाद उसका
फल
तो भोगना ही पड़ता है। इसलिए
एरण्ड
(रेड़ी)
के तेल के
फेन
के समान इन सबका परित्याग कर देना चाहिए।
संन्यासी
को न तो किसी
देवी-देवता
का
प्रसाद
ग्रहण करना चाहिए और न ही किसी
बाह्य देवता
आदि की
पूजा
करनी चाहिए।
संन्यासी
को चाहिए कि वह अपने अतिरिक्त सभी का
त्याग
करके अपने
हाथरूपी पात्र
से
मधुकरी-वृत्ति
द्वारा जीवन-यापन करे। इस प्रकार जीवन-यापन करने से उसके
शरीर
में
चर्बी
की वृद्धि नहीं होती। उसे सदा
विचरण
करते रहना चाहिए। वह
हाथरूपी पात्र
अथवा
मुखरूपी पात्र
द्वारा
भिक्षा
ग्रहण करते हुए जीवन व्यतीत करे।
संन्यासी
को
पेट
के चार भागों में से
दो भाग
में
आहार
(भोजन)
ग्रहण करना चाहिए।
एक भाग
जल
के लिए तथा
एक भाग
वायु-संचरण
के लिए रिक्त रखना चाहिए।
संन्यासी
को सदा
भिक्षावृत्ति
पर ही आश्रित रहना चाहिए। उसे हमेशा
एक ही घर
से
भोजन
ग्रहण नहीं करना चाहिए। जो
शान्त भाव
से उसकी प्रतीक्षा करते हों, उन्हीं के यहाँ प्रयत्नपूर्वक
भोजन
के लिए जाना चाहिए।
संन्यासी
को
श्रेष्ठ आचरण
वाले
पाँच
या
सात घरों
में
भिक्षा
के लिए जाना चाहिए तथा
गौ
के
दोहन
में जितना समय लगता है, उतनी ही देर तक प्रतीक्षा करनी चाहिए। वह जहाँ से एक बार
भिक्षा
ग्रहण कर ले, वहाँ पुनः नहीं जाना चाहिए।
रात्रि
के
आहार
(भोजन)
की अपेक्षा
उपवास
अधिक श्रेष्ठ है।
उपवास
की अपेक्षा
अयाचित भिक्षा
(बिना माँगी हुई भिक्षा)
अधिक श्रेष्ठ है।
अयाचित भिक्षा
की अपेक्षा
माँगकर भिक्षा ग्रहण करना
कहीं अधिक श्रेष्ठ है। अतः यथासम्भव
भिक्षा
का ही आश्रय लेना चाहिए।
भिक्षा
के समय
सव्य-अपसव्य
(दाएँ-बाएँ)
मार्ग से
घर
में प्रवेश नहीं करना चाहिए। जिस
घर
में किसी प्रकार का
दोष
न हो, उसे
भूल
अथवा
मोह
वश भी नहीं छोड़ना चाहिए
(वहाँ भिक्षा ग्रहण कर लेनी चाहिए)
।
यदि
श्रोत्रिय
(वेदज्ञ)
श्रद्धा
और
भक्ति
से विहीन हो, तो उसके यहाँ
भिक्षा
स्वीकार नहीं करनी चाहिए। इसके विपरीत, जो
संस्कारविहीन
(व्रात्य)
होते हुए भी
श्रद्धा
और
भक्ति
रखता हो, उसके यहाँ
भिक्षा
ग्रहण करनी चाहिए।
संन्यासियों
की
भिक्षा
पाँच प्रकार की कही गई है—
असंकल्पित माधूकर
,
प्राक्प्रणीत
,
अयाचित
,
तात्कालिक
तथा
उपपत्र
।
मन
में किसी भी प्रकार का
संकल्प
किए बिना, किसी भी
तीन
,
पाँच
अथवा
सात घरों
से
मधुमक्खी
के समान थोड़ी-थोड़ी
भिक्षा
ग्रहण करना
असंकल्पित माधूकर
कहलाता है।
यदि
प्रातःकाल
अथवा
पिछले दिन
कोई
मनुष्य
भक्तिपूर्वक
भिक्षा
के लिए निवेदन करे, तो उसके यहाँ जो
भिक्षा
ग्रहण की जाती है, उसे
प्राक्प्रणीत भिक्षा
कहते हैं।
भिक्षा
के लिए विचरण करते समय यदि
संन्यासी
को कोई
व्यक्ति
निमंत्रित करे, तो उसे उस
व्यक्ति
के यहाँ
अयाचित भिक्षा
ग्रहण कर लेनी चाहिए।
भिक्षा
के लिए निकलते समय यदि कोई
ब्राह्मण
संन्यासी
के समीप आकर उसे
भोजन
करने के लिए कहे, तो वह ऐसी
तात्कालिक भिक्षा
को सदा स्वीकार कर सकता है। यदि कोई
ब्राह्मण
मठ
(आश्रम)
में
सिद्ध
(तैयार)
भोजन लेकर आए, तो उसे
साधु
उपपत्र भिक्षा
कहते हैं।
यदि
संन्यासी
को
भिक्षा
की विशेष आवश्यकता पड़ जाए, तो उसे
म्लेच्छ
के यहाँ से भी भिक्षा माँग लेनी चाहिए; परन्तु कभी भी
एक ही स्थान
से
आहार
स्वीकार नहीं करना चाहिए, चाहे वह
बृहस्पति
के समान पूज्य व्यक्ति का ही घर क्यों न हो।
संन्यासी
को सदा
याचित
अथवा
अयाचित भिक्षा
के द्वारा ही अपना निर्वाह करना सर्वथा उचित है।
वायु
सभी को स्पर्श करता है,
अग्नि
सभी को जलाती है और
जल
में सभी प्रकार के
मल-मूत्र
आदि डाल दिए जाते हैं; फिर भी ये सभी उन दोषों के स्पर्श से
प्रदूषित
नहीं होते। उसी प्रकार
संन्यासी
भी किसी अन्य
दोष
से दूषित नहीं होता।
अग्नि
,
धूम्र
एवं
मूसल
के शब्द से रहित, जहाँ
अग्नि
बुझकर शान्त हो चुकी हो तथा उपस्थित सभी लोग
भोजन
कर चुके हों, उसी स्थान पर
योगी
को
मध्याह्न
के पश्चात्
भिक्षा
ग्रहण करनी चाहिए।
आपत्तिकाल
में
संन्यासी
निन्दनीय परिवार
,
पतित
तथा
पाखण्डी
पदच्युत
व्यक्तियों का परित्याग करके समस्त
वर्णों
और
जातियों
के यहाँ से
भिक्षा
प्राप्त कर सकता है।
संन्यासी
के लिए
घृत
कुत्ते के मूत्र
के समान,
शहद
मदिरापान
के समान तथा
तेल
सूअर के मूत्र
के समतुल्य माना गया है।
लहसुन
युक्त पदार्थ तथा
उड़द
,
अपूप
(मालपुआ)
आदि के पदार्थ
गोमांस
के समान माने गए हैं।
दूध
मूत्र
के समान माना गया है। अतः
संन्यासी
को सदा
घृत
आदि से रहित
भिक्षा
ही प्रयत्नपूर्वक स्वीकार करनी चाहिए।
घृत
एवं
सूपादि
(चटनी, मिर्च-मसाला आदि)
से युक्त
पकवान
कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए।
संन्यासी
के लिए उसका
हाथ
ही
भोजन ग्रहण
करने का
पात्र
है। उसी
हाथरूपी पात्र
में सदा
भिक्षा
ग्रहण करनी चाहिए। इस प्रकार
संन्यासी
को
दिन
में केवल
एक बार
ही
भोजन
ग्रहण करना चाहिए।
दो बार
भोजन
कदापि नहीं करना चाहिए। जो
मुनि
गौ
की भाँति केवल
मुख
से
भोजन
ग्रहण करता है
(संचय नहीं करता)
, वह सभी के प्रति
समभाव
प्राप्त करके
अमृतत्व
को प्राप्त कर लेता है।
घृत
(आज्य)
को
रुधिर
के समान तथा इकट्ठा किए हुए
अन्न
को
मांस
के समान त्याग देना चाहिए।
गन्ध
एवं
लेपन
को गन्दी वस्तु के समान,
नमक
को
अन्त्यज
के समान,
वस्त्र
को जूठे पात्र के सदृश,
तेल-मालिश
को
स्त्री-प्रसंग
की भाँति,
मित्रों
की
हँसी-मजाक
को
मूत्र
के समान,
घमण्ड
को
गौ-मांस
के समान,
परिचित-मित्रों
के घर की
भिक्षा
को
चण्डाल
के सदृश,
स्त्री
को
सर्पिणी
के समान,
सुवर्ण
(सोने)
को
कालकूट
के समान,
सभा
आदि को
श्मशान
के समान,
राजधानी
को
कुम्भीपाक नरक
के समान तथा
एक ही घर
के
भोजन
को
मृतक-पिण्ड
के समान जानकर इन सबका परित्याग कर देना चाहिए।
देवताओं
का
पूजन-अर्चन
कभी नहीं करना चाहिए।
सांसारिक प्रपञ्चों
का त्याग करके उसे
जीवन्मुक्त
बनना चाहिए।
आसन
,
पात्रलोप
(बर्तनों की चाह)
,
सञ्चय
,
शिष्य बनाना
,
दिन
में
शयन
तथा
व्यर्थ की बातें
करना—ये छह प्रकार के कार्य
संन्यासी
को
बन्धन
में डालने वाले हैं।
वर्षा
(पानी)
से सुरक्षित जो स्थान हो, उसे
आसन
कहा जाता है। कहे गए
पात्रों
में से
तुम्बी
आदि किसी एक
पात्र
को ही ग्रहण करना चाहिए।
संन्यासी
के व्यवहार के लिए
तुम्बी
आदि पात्र निर्धारित किए गए हैं।
उनके खो जाने पर
दूसरे
के
पात्र
को ग्रहण कर लेना ही
पात्रलोप
कहलाता है। अपना
दण्ड
खो जाने पर दूसरे का
दण्ड
ग्रहण कर लेना
परिग्रह
है।
कालान्तर
(भविष्य)
में
भोग
के लिए
संग्रह
करके रखना ही
सञ्चय
कहलाता है।
शुश्रूषा
,
लाभ
,
पूजा
तथा
यश
के लिए चेष्टा करना भी
परिग्रह
है।
जो
शिष्य
आत्मकल्याण
की भावना से तथा
करुणा
के पात्र के रूप में आए, उसी को
शिष्य
बनाना चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य किसी को
शिष्य
बनाना ही
शिष्य-संग्रह
कहलाता है।
संन्यास
में
विद्या
को
दिन
और
अविद्या
को
रात्रि
कहा गया है।
इसी कारण
विद्या
के
अभ्यास
में
प्रमाद
करना ही
दिन में शयन
करना कहा गया है।
आध्यात्मिक कथा
के अतिरिक्त
भिक्षा
की बात अथवा
अनुग्रह-परिप्रश्न
(उत्तर देने)
के अतिरिक्त जो भी वार्ता की जाए, उसे
व्यर्थ वार्तालाप
माना जाता है।
एकान्तवास
,
मद
(अहंकार)
,
मात्सर्य
(ईर्ष्या)
,
गन्ध
,
पुष्प
,
विभूषण
,
ताम्बूल
,
अभ्यञ्जन
(तेल-मालिश)
,
क्रीड़ा
,
भोग की आकांक्षा
तथा
रसायन
(कायाकल्प आदि)
—इन सबका
संन्यासी
को परित्याग करना चाहिए।
डींग मारना
,
निन्दा
,
स्वस्तिवाचन
,
ज्योतिष
,
क्रय-विक्रय
,
कर्मकाण्ड सम्बन्धी क्रियाएँ
,
कर्म-विवाद
तथा
गुरु के वचनों का उल्लंघन
—इन सबका
संन्यासी
को परित्याग करना चाहिए।
सन्धि
,
विग्रह
,
यान
,
मञ्च
(पलङ्ग)
,
श्वेत वस्त्र
,
वीर्य-त्याग
,
दिन
में
शयन
तथा
धातु
(सोना आदि)
के
भिक्षापात्र
—इन सबका
संन्यासी
को परित्याग करना चाहिए।
विष
,
आयुध
(शस्त्र)
,
बीज
,
हिंसा
,
तीक्ष्णता
तथा
मैथुन
—इन सबका
संन्यासयोग
के द्वारा परित्याग कर देना चाहिए। इसी प्रकार
गृहधर्म
आदि सभी
व्रतों
का भी त्याग कर देना चाहिए।
गृहस्थ
के
धर्म
,
व्रत
,
गोत्र
आदि के
आचरण
,
पिता
तथा
माता
के
कुल
की
सम्पत्ति
आदि
संन्यासी
के लिए निषिद्ध बताए गए हैं। इन सबका सेवन करने से
नीच गति
की प्राप्ति होती है।
वृद्धावस्था
को प्राप्त
विद्वान् संन्यासी
को
वृद्धा स्त्री
पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए; क्योंकि
पुरानी गुदड़ी
(कथरी)
में
पुराना वस्त्र
ही लगाया जाता है।
स्थावर
(जड़)
,
जंगम
,
बीज
,
सुवर्ण
,
विष
तथा
आयुध
—इन छह प्रकार की वस्तुओं को
संन्यासी
मूत्र
एवं
विष्ठा
के समान त्याज्य समझकर कभी ग्रहण न करे।
आपत्तिकाल
के अतिरिक्त
संन्यासी
को मार्ग के लिए अपने पास कुछ भी संग्रह करके नहीं रखना चाहिए। यदि
कुयोगवश
अन्न
प्राप्त न हो, तो
पक्वान्न
(पका हुआ अन्न)
ग्रहण कर लेना चाहिए।
स्वस्थ
तथा
युवावस्था
को प्राप्त
संन्यासी
को कभी भी किसी के
घर
में नहीं रुकना चाहिए। उसे न तो किसी की कोई
वस्तु
ग्रहण करनी चाहिए और न ही अपनी कोई
वस्तु
किसी को देनी चाहिए।
संन्यासी
को अन्य
भूत-प्राणियों
के
कल्याण
के लिए
दीनता
(दया)
का आचरण करना चाहिए।
पका हुआ
अथवा
कच्चा अन्न
माँगने से
संन्यासी
निम्न गति
को प्राप्त होता है।
खाने-पीने
के पदार्थों की सदा
इच्छा
रखने वाला तथा
वस्त्रों
में
ऊनी वस्त्र
,
बिना ऊन के बने वस्त्र
,
रेशमी वस्त्र
आदि को स्वीकार करने वाला
संन्यासी
निश्चित रूप से
अधःपतन
को प्राप्त होता है।
उसे
अद्वैतरूपी नौका
में आसीन होकर
जीवनमुक्ति
की
अवस्था
प्राप्त कर लेनी चाहिए।
यदि
वाणी
को दण्ड देना हो, तो
(संन्यासी को)
मौन
रहना चाहिए। यदि
काया
(शरीर)
को दण्ड देना हो, तो
भोजन
नहीं करना चाहिए, अर्थात्
व्रत
एवं
उपवास
रखना चाहिए। यदि
मन
को दण्ड देने की इच्छा हो, तो
प्राणायाम
करना चाहिए।
समस्त प्राणी कर्मों के द्वारा बन्धन में बंधते हैं और विद्या (आत्मज्ञान) के द्वारा मुक्ति को प्राप्त करते हैं। इसी कारण ज्ञानवान् संन्यासी कर्म से सर्वदा दूर रहते हैं।
गलियों
(वीथियों)
में बहुत से
पुराने वस्त्र
प्राप्त हो जाते हैं तथा
भिक्षा
भी सर्वत्र उपलब्ध होती रहती है।
पृथ्वी
पर कहीं भी
शयन
करने का स्थान मिल सकता है, तो फिर
संन्यासी
को और किस बात का दुःख है?
संन्यासी
को सभी प्रकार के
प्रपञ्च
(माया)
को
ज्ञानाग्नि
में भस्म कर देना चाहिए। जो
संन्यासी
अपनी
अन्तरात्मा
में
ज्ञानरूपी अग्नि
का समारोप कर लेता है, वही
महान् ज्ञानी
अग्निहोत्री
कहलाता है।
संन्यासियों
की दो प्रकार की
प्रवृत्तियाँ
होती हैं—
मार्जारी
वानरी
जो
संन्यासी
ज्ञान
का अभ्यास करते हैं, उनमें मुख्य रूप से
मार्जारी प्रवृत्ति
तथा गौण रूप से
वानरी प्रवृत्ति
होती है।
संन्यासी
को
बिना पूछे
कभी नहीं बोलना चाहिए। यदि कोई
अनीति
अथवा
अन्यायपूर्वक
प्रश्न करे, तब भी उसे उत्तर नहीं देना चाहिए।
ज्ञानवान्
होते हुए भी
संन्यासी
को
(जनसामान्य के समक्ष)
मूढ़
के सदृश आचरण करना चाहिए।
यद्यपि किसी कारणवश
पाप-प्रसङ्ग
उपस्थित हो जाए, तो
बारह हजार
की संख्या में
तारक मन्त्र
का
जप
करके उस
पाप
का नाश कर देना चाहिए।
जो
संन्यासी
नित्य-प्रतिदिन
बारह हजार
बार
ॐकार
रूपी
प्रणव मन्त्र
का
जप
करता है, उसे
बारह मास
के भीतर ही
अविनाशी परब्रह्म
का
(अपने इष्ट का)
साक्षात्कार
हो जाता है। ऐसी यह
(रहस्यमयी संन्यास)
उपनिषद्
है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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