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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 68
निरंशध्यानविश्रान्तिमूकस्य मम मस्तके। कदा ताणं करिष्यन्ति कुलायं वनपत्रिणः ॥
मैं उस अंश-विहीन अविनाशी ब्रह्म के चिन्तन में इस तरह से कब निश्चल हो जाऊँगा कि कोयल पक्षी हमारे मस्तक पर घोंसला विनिर्मित कर लें।
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