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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 58
भ्रष्टबीजोपमा भूयो जन्माङ्करविवर्जिता। हृदि जीवद्विमुक्तानां शुद्धा भवति वासना ॥
जिस प्रकार से भुना हुआ बीज अंकुर प्रकट करने में असमर्थ रहता है, उसी प्रकार जो जीवन से मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं, उन सभी के हृदय की वासना-आसक्ति प्रायः पवित्रता से युक्त हो जाती है।
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