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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 14
अदग्धमहतं कीटैः पर्वग्रन्थिविराजितम्। नासादघ्नं शिरस्तुल्यं ध्रुवोर्वा बिभ्याद्यतिः ॥
कृमि-कीटक आदि के द्वारा खाया भी न गया हो पर्व ग्रन्थि-युक्त (गाँठ सहित) वह (दण्ड) लम्बाई में नासिका, शिखा (चोटी) अथवा भृकुटी तक का होना चाहिए।
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