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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 31
जडया कर्णशष्कुल्या कल्यमानक्षणस्थया। शून्यकृतिः शून्यभवः शब्दो नाहमचेतनः ॥
मैं (संन्यासी) वह जड़ शब्दरूप नहीं हूँ, जो क्षणमात्र ही ठहरता है। मैं शून्य, आकृतिरहित एवं अचेतन भी नहीं हूँ।
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