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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 48
नमस्तुभ्यं परेशाय नमो महां शिवाय च। तिष्ठन्नपि हि नासीनो गच्छन्नपि न गच्छति। शान्तोऽपि व्यवहारस्थः कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥
मुझ परम ईश्वर तथा शिव स्वरूप को नमस्कार है। यह (आत्मा) बैठता हुआ आसीन नहीं होता, जाते हुए भी नहीं जाता, शान्त रहते हुए भी व्यवहार में लगा रहता है, कार्य करता हुआ भी कभी आसक्त नहीं होता।
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