यदि आतुर संन्यासीसंन्यास ग्रहण करने की इच्छा से जीवित रहे, तभी उसे क्रम-संन्यास प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए।
शूद्र, स्त्री, पतित तथा रजस्वला से कभी भी सम्भाषण नहीं करना चाहिए।
किसी भी देवता के पूजनोत्सव को देखने के लिए संन्यासी को कभी नहीं जाना चाहिए।
ये लौकिक कार्यसंन्यासी के लिए नहीं हैं।
आतुर और कुटीचक का भूः एवं भुवः लोक होता है, बहूदक का स्वर्गलोक, हंस का तपोलोक तथा परमहंस का स्थान सत्यलोक होता है।
तुरीयातीत तथा अवधूत श्रेणी के लोग भ्रमर-कीट न्याय के समान अपने स्वरूप का अनुसंधान करते हुए कैवल्य(केवल आत्मतत्त्व) में प्रतिष्ठित हो जाते हैं।
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