स्वरूपानुसंधानव्यतिरिक्तान्यशास्त्राभ्यास उष्ट्रकुङ्कुमभारवद्वयर्थः । न योगशास्त्र प्रवृत्तिः । न सांख्यशास्त्राभ्यासः । न मन्त्रतन्त्रव्यापारः । नेतरशास्त्रप्रवृत्तिर्यतेरस्ति। अस्ति चेच्छवालंकारवत्कर्माचारविद्यादूरः । न परिव्राण्नामसंकीर्तनपरो यद्यत्कर्म करोति तत्तत्फल-मनुभवति । एरण्डतैलफेनवत्सर्व परित्यजेत्। न देवताप्रसादग्रहणम्। न बाह्यदेवाभ्यर्चनं कुर्यात् ॥
संन्यासी के लिए अपने स्वरूप के अनुसंधान के अलावा अन्य विभिन्न शास्त्रों का निरन्तर अभ्यास करना, ऊंट के ऊपर केशर लादने के सदृश बेकार है। संन्यासी के लिए योग को प्रवृत्ति अथवा सांख्य शास्त्र का मंत्र-तंत्र का व्यापार आदि तथा किसी भी शास्त्र की प्रवृत्ति वर्जनीय है। यदि कोई संन्यासी ऐसा करता है, तो वह मृतक शव के ऊपर आभूषणों के समान है तथा संन्यासी के कर्म एवं विद्या के अनुकूल नहीं है। संन्यासी को किसी भी देवता के नाम तथा कीर्तन आदि में भाग नहीं लेना चाहिए। कारण यह है कि कोई भी कार्य करने के बाद उसका फल तो भोगना ही पड़ेगा। इसलिए एरण्ड (रेड़ी) तेल के फेन के सदृश सभी का परित्याग कर देना चाहिए। संन्यासी को न तो किसी देवी-देवता का प्रसाद ग्रहण करना चाहिए और न ही किसी बाह्य देवता आदि की पूजा ही करनी चाहिए।
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