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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 108
स्थावरं जङ्गमं बीजं तैजसं विषमायुधम्। षडेतानि न गृह्णीयाद्यतिर्मूत्रपुरीषवत् ॥
स्थावर (जड़), जंगम, बीज, सुवर्ण, विष, आयुध आदि इन छः बस्तुओं को संन्यासी मूत्र एवं विष्ठा के समतुल्य त्याज्य समझ करके कभी ग्रहण न करे।
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