यदि वाणी को दण्ड देना हो, तो (संन्यासी को)मौन रहना चाहिए।
यदि काया(शरीर) को दण्ड देना हो, तो भोजन नहीं करना चाहिए, अर्थात् व्रत एवं उपवास रखना चाहिए।
यदि मन को दण्ड देने की इच्छा हो, तो प्राणायाम करना चाहिए।
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