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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 16
जगञ्जीवनं जीवनाधारभूतं मा ते मा मन्त्रयस्व सर्वदा सर्वसौम्येति कमण्डलुं परिगृह्य योगपट्टाभिषिक्तो भूत्वा यथासुखं विहरेत् ॥
हे सर्वसौम्य! आप जीवन के आधारभूत जल को धारण करने वाले हैं, मुझसे मन्त्रणा करते रहें- इस प्रकार से कहकर संन्यासी कमण्डलु को हाथ में ग्रहण कर योग पट्ट से सुशोभित होकर सुखानुभूतिपूर्वक यंत्र-तत्र भ्रमण करे।
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