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संन्यास • अध्याय 2 • श्लोक 100
शिष्याणां नतु कारुण्याच्छिष्यसंग्रह ईरितः। विद्या दिवा प्रकाशत्वादविद्या रात्रिरुच्यते ॥
जो शिष्य आत्मकल्याण की भावना से तथा करुणा के पात्र के रूप में आए, उसी को शिष्य बनाना चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य किसी को शिष्य बनाना ही शिष्य-संग्रह कहलाता है। संन्यास में विद्या को दिन और अविद्या को रात्रि कहा गया है।
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