जो शिष्यआत्मकल्याण की भावना से तथा करुणा के पात्र के रूप में आए, उसी को शिष्य बनाना चाहिए।
इसके अतिरिक्त अन्य किसी को शिष्य बनाना ही शिष्य-संग्रह कहलाता है।
संन्यास में विद्या को दिन और अविद्या को रात्रि कहा गया है।
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